ज्योतिषाचार्य मनीष मोहन के अनुसार, वधू प्रवेश, वर वरण, कन्यावरण, बरच्छा, विवाह से संबंधित समस्त कार्य, मुंडन, यज्ञोपवीत, दीक्षा ग्रहण, गृहप्रवेश, गृहारंभ, कर्णवेध, प्रथम बार तीर्थ पर गमन, देव स्थापन, देवालय का आरंभ, मूर्ति स्थापन, किसी विशिष्ट यज्ञ का आरंभ, कामना परक कर्म का आरंभ, व्रतारंभ, व्रत का उद्यापन आदि कार्य खरमास मे नहीं किए जाते हैं।
खरमास की शुरुआत 16 दिसंबर से हो रही है। इस दिन शाम सात बजकर 14 मिनट पर सूर्य धनु राशि में प्रवेश कर रहे हैं। अगले एक महीने तक सूर्य राशि में संचरण करते रहेंगे । 14 जनवरी के रात्रि शेष तक तीन बजकर एक मिनट पर सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेंगे। 15 को मकर संक्रांति मनाई जाएगी। खरमास के दौरान एक माह तक शुभ कार्य वर्जित रहेंगे।
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ज्योतिर्विद पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार, सूर्य जब धुन राशि में पहुंचते हैं तो धनु की संक्रांति लगती है। इसी दिन से खरमास प्रारंभ हो जाता है और मकर की संक्रांति लगते ही खरमास समाप्त हो जाता है। खरमास को प्रारंभ हुए 15 दिन व्यतीत हो जाएं तब एक दिन तेल के पकौड़े बनाकर चील-कौवों को खिला दें।
इस मास में भगवत पूजन का विशेष महत्व है। अनेकों मंदिरों मे धनुर्मास का उत्सव मनाया जाता है। इस महीने में दही-भात और दूध से निर्मित पकवान (खीर आदि) के भोग का विशेष महत्व है। निष्काम भाव से धर्मशास्त्र के पुस्तक का वाचन, स्तोत्र पाठ आदि धार्मिक क्रियाओं को संपन्न करने का विधान है।
पंडित शरद चंद्र मिश्र के अनुसार, वर्ष में सूर्य की 12 संक्रांतियां होती है। इन बारह राशियों पर सूर्य की स्थिति रहती है। प्रत्येक एक मास तक एक राशि पर रहने के बाद सूर्य दूसरे राशि में प्रवेश करता है। इसमे दो संक्रांतियों पर सूर्य बृहस्पति की राशि पर रहता है। ये है धनु और मीन राशियां हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब सूर्य की स्थिति बृहस्पति की राशि पर होती है तो बृहस्पति का तेज समाप्त हो जाता है।
उन्होंने कहा कि मांगलिक कार्यों के लिए तीन ग्रहों के बल की आवश्यकता है। ये हैं सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति। इनमें किसी भी ग्रह के बल में न्यूनता होने से मांगलिक कार्य अवरूद्ध हो जाते हैं। खरमास के महीने में बृहस्पति के बलहीन होने से शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं। इसी प्रकार जब महीने मे सूर्य चंद्रमा के अत्यंत सन्निकट आ जाता है, तो उस समय भी शुभ मुहूर्त का अभाव रहता है। यह स्थिति प्रत्येक महीने में अमावस्या के आसपास देखी जाती है। इसे मासांत दोष की संज्ञा से विभूषित किया गया है।
न करें ये कार्य
ज्योतिषाचार्य मनीष मोहन के अनुसार, वधू प्रवेश, वर वरण, कन्यावरण, बरच्छा, विवाह से संबंधित समस्त कार्य, मुंडन, यज्ञोपवीत, दीक्षा ग्रहण, गृहप्रवेश, गृहारंभ, कर्णवेध, प्रथम बार तीर्थ पर गमन, देव स्थापन, देवालय का आरंभ, मूर्ति स्थापन, किसी विशिष्ट यज्ञ का आरंभ, कामना परक कर्म का आरंभ, व्रतारंभ, व्रत का उद्यापन आदि कार्य खरमास मे नहीं किए जाते हैं।