हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी मनाई जाती है। ज्येष्ठ माह में कालाष्टमी दो जून यानी आज मनाई जा रही है। इस दिन महादेव के साथ उनके अवतार भगवान काल भैरव की पूजा की जाती है। काल भैरव के आठ स्वरूप माने गए हैं। इनमें से बटुक भैरव की पूजा आमजन द्वारा की जाती है जो बहुत ही लाभकारी है। ये भक्तों को भय से मुक्ति दिलाते हैं।
कालाष्टमी व्रत का महत्व
पंडित राकेश पांडेय के अनुसार कालभैरव की पूजा-अर्चना करने से नकारात्मक शक्तियां, शत्रु और सभी पापों से मुक्ति मिलती है। साथ ही श्रद्धलुओं की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। सौर मंडल का कोई ग्रह अशुभ प्रभाव दे रहा हो तो कालभैरव का व्रत करने से ग्रह का अशुभ प्रभाव खत्म हो जाता है। इनकी पूजा-पाठ से किसी भी प्रकार का जादू-टोना खत्म हो जाता है, भूत-प्रेत से मुक्ति मिलती है और भय आदि भी खत्म हो जाता है।
कालाष्टमी व्रत पूजा विधि
पंडित अरविंद गिरि।
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पंडित अरविंद गिरि के अनुसार कालाष्टमी के दिन ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें। इसके बाद घर के मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती के साथ कालभैरव की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। गंगाजल का छिड़ककर स्थान का पवित्र करें। फिर पुष्प अर्पित करें। नारियल, इमरती, पान, मदिरा, गेरु आदि चीजें भगवान को अर्पित करें। इसके बाद चौमुखी दीपक जलाएं और धूप-दीप करें और कुमकुम या हल्दी से सभी को तिलक लगाएं और सभी की एक-एक करके आरती उतारें। इसके बाद शिव चालीसा और भैरव चालिसा का पाठ करें। इसके साथ ही भैरव मंत्रों की 108 बार जप करें। काले कुत्ते को मीठी रोटी या फिर दूध पीलाएं और दिन के अंत में कुत्ते की भी पूजा करें। इसके बाद रात्रि के समय काल भैरव की सरसों के तेल, उड़द, काला तिल चढ़ा दीपक जलाकर पूजा-अर्चना करें और रात्रि जागरण करें। अगले दिन स्नान के बाद दान-पुण्य कर व्रत का पारण करें।