इक्ष्वाकु वंशीय राजघराने के राजकुमार सिद्धार्थ गौतम के महात्मा बुद्ध बनने की साक्षी कपिलवस्तु की धरती जल्द ही उनकी साधना परंपरा को विश्व से रूबरू कराएगी। यहां बौद्ध धर्म की प्रमुख साधना पद्धति विपश्यना सिखाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर का केंद्र विकसित किया जाएगा।
राज्य और केंद्र सरकार को कपिलवस्तु में अंतरराष्ट्रीय स्तर का विपश्यना केंद्र बनाए जाने के लिए प्रस्ताव भी भेजा जा चुका है।बता दें कि सिद्धार्थ गौतम ने राजपाट और परिवार छोड़ने के बाद ज्ञान प्राप्त करने के लिए योग साधना की जो प्रक्रिया अपनाई थी उसे विपश्यना कहते हैं।
पाली भाषा के शब्द विपासना का अर्थ होता है पीछे देखना या अंतः के दर्शन करना। बौद्ध धर्म के अनुयायी ही नहीं, यह ध्यान पद्धति आध्यात्मिक रुचि रखने वाले लगभग हर धर्म के मतावलंबी भी अपनाते हैं। सिद्धार्थ गौतम के पिता शुद्धोधन के राजमहल और पिपरहवा स्तूप के कारण सिद्धार्थनगर जिला अंतरराष्ट्रीय पर्यटन और बौद्ध पयर्टकों की आस्था का केंद्र है।
महात्मा बुद्ध की शिक्षा, अष्टांग मार्ग, निर्वाण, पंचशील आदि की शिक्षा देने के उद्धेश्य से कपिलवस्तु में अंतरराष्ट्रीय स्तर का विपश्यना केंद्र खोले जाने की तैयारी है। सांसद जगदंबिका पाल ने बताया कि कपिलवस्तु को अंतरराष्ट्रीय पर्यटन और महात्मा बुद्ध की शिक्षा के केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए यह प्रोजेक्ट तैयार किया गया है। बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को और केंद्र के पर्यटन मंत्रालय को विपश्यना केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव भेजा है। जल्द ही इस पर काम शुरू होगा।
क्या है विपश्यना
विपश्यना साधना के जरिए चित्त की शुद्धि की जाती है। विपश्यना करने वाले व्यक्ति में राग, द्वेष, भय, मोह, अहंकार, लालच आदि विकार धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं। वह शारीरिक-मानसिक बंधनों से मुक्ति हो जाता है। विपश्यना के तीन चरण होते हैं। पहले चरण में साधक को त्रिशरण व पंचशील का पालन करना पड़ता है।
जीव हिंसा और चोरी से विरत रहना, व्यभिचार से दूर रहना, असत्य बोलने और मादक पदार्थों के सेवन से परहेज करना होता है। दूसरा चरण आनापान है। शब्द आन-अपान का अर्थ सांस के अंदर आने और बाहर
निकलना है। इस चरण में साधक सांस पर एकाग्र होकर मन को स्थिर करना सीखता है।
सांस के आने-जाने को अपने ही अनुभव से नासिका के दोनों द्वारों पर देखना सिखाया जाता है। तीसरे चरण में साधक विपश्यना में पारंगत होता है। इस चरण में साधक की प्रज्ञा जागृत होती है और उसे नित्य-अनित्य का बोध
होने लगता है। साधक को देखते अंतः की वेदना-संवेदनाए वास्तविक स्वभाव में स्पष्ट होने लगती हैं।