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शोहरतगढ़ की जनता ने दिया था जुल्म का जवाब, 'बापू' ने नवजीवन में लिखा था इस प्रकरण पर लेख

Fri, 14 Aug 2020 06:29 PM IST
vivek shukla संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर।
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महात्मा गांधी - फोटो : फाइल फोटो
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महात्मा गांधी के आह्वान पर चल रहा असहयोग आंदोलन चार फरवरी 1922 को चौरीचौरा कांड के बाद स्थगित कर दिया गया था। इसके बाद शोहरतगढ़ समेत पूरे क्षेत्र में अंग्रेजों ने लोगों पर जुल्म ढहाया, जिसका जिक्र महात्मा गांधी ने अपने पत्र नवजीवन में किया था।

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चौरीचौरा कांड के बाद 25 अप्रैल 1922 को पुलिस ने आंदोलनकारियों को मारापीटा और उन पर अमानवीय जुल्म किए। 29 अप्रैल को चिल्हिया में पुलिस ने कांग्रेस कार्यालय को जला दिया था। वहां मौजूद कार्यकर्ताओं पर जमकर लाठियां बरसाई गईं। स्वतंत्रता सेनानी परमेश्वर दत्त समेत अन्य आंदोलनकारी चुपचाप पिटते रहे। अंग्रेजी जुल्म से अमर शहीद बुधई ने दम तोड़ दिया था, लेकिन आंदोलनकारी हिंसक नहीं हुए।

उन्होंने अहिंसक तरीके से देश की आजादी के लिए संघर्ष जारी रखा। इस घटना की जांच के लिए महात्मा गांधी ने अपने बेटे देवदास गांधी को भेजा। देवदास गांधी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि अंग्रेजी दमन के दौरान आंदोलनकारी न तो बदला लेने के लिए हिंसक हुए और न ही उन्होंने दमन से बचने के लिए माफी मांगी। वह अंग्रेजों के जुल्म को सहते हुए अहिंसक तरीके से आजादी के संघर्ष करते रहे।

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शीतल प्रसाद ने जमींदारों पर कसी थी नकेल

अंग्रेजी हुकूमत में जिले के बांसी और शोहरतगढ़ में ब्रिटिश हुकूमत के पिट्ठू जमींदारों ने किसानों पर जुल्म की इंतहा कर दी थी। तब शोहरतगढ़ के तेज तर्रार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. शीतल प्रसाद त्रिपाठी ने किसानों के सहयोग से आंदोलन कर इन जमींदारों की नकेल कसी थी। जमींदार स्थानीय किसानों और देश की आजादी की लड़ाई लड़ने वाले आंदोलनकारियों को अपने निजी सेना के लठैतों से पिटवाते थे।

वर्ष 1940 में बांसी के जमींदार ने धन नहीं देने वाले किसानों को बांधकर पिटवाया और उसके मकान को कब्जा कर लिया। इसके विरोध में शीतल प्रसाद त्रिपाठी अपने साथी द्वारिका प्रसाद यादव के साथ मिलकर आंदोलन खड़ा कर दिए। उन्होंने बड़ी जनसभा कर जमींदार को ललकारा और किसानों को न्याय दिलाने तक डटे रहे। अंग्रेज कलेक्टर रेडची ने किसानों को घर और खेत वापस करने का आदेश दिया तब जाकर आंदोलन खत्म हुआ।
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