महात्मा गांधी के आह्वान पर चल रहा असहयोग आंदोलन चार फरवरी 1922 को चौरीचौरा कांड के बाद स्थगित कर दिया गया था। इसके बाद शोहरतगढ़ समेत पूरे क्षेत्र में अंग्रेजों ने लोगों पर जुल्म ढहाया, जिसका जिक्र महात्मा गांधी ने अपने पत्र नवजीवन में किया था।
चौरीचौरा कांड के बाद 25 अप्रैल 1922 को पुलिस ने आंदोलनकारियों को मारापीटा और उन पर अमानवीय जुल्म किए। 29 अप्रैल को चिल्हिया में पुलिस ने कांग्रेस कार्यालय को जला दिया था। वहां मौजूद कार्यकर्ताओं पर जमकर लाठियां बरसाई गईं। स्वतंत्रता सेनानी परमेश्वर दत्त समेत अन्य आंदोलनकारी चुपचाप पिटते रहे। अंग्रेजी जुल्म से अमर शहीद बुधई ने दम तोड़ दिया था, लेकिन आंदोलनकारी हिंसक नहीं हुए।
उन्होंने अहिंसक तरीके से देश की आजादी के लिए संघर्ष जारी रखा। इस घटना की जांच के लिए महात्मा गांधी ने अपने बेटे देवदास गांधी को भेजा। देवदास गांधी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि अंग्रेजी दमन के दौरान आंदोलनकारी न तो बदला लेने के लिए हिंसक हुए और न ही उन्होंने दमन से बचने के लिए माफी मांगी। वह अंग्रेजों के जुल्म को सहते हुए अहिंसक तरीके से आजादी के संघर्ष करते रहे।