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विश्वनाथ के नाम से ही खौफ खाते थे अंग्रेज, कालकोठरी भी डिगा नहीं सकीं आजादी के दीवाने का हौसला

Fri, 14 Aug 2020 02:16 PM IST
vivek shukla संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया।
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विश्वनाथ राय। (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला।
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उनके हौसलों को न राह की मुश्किलें डिगा सकीं और न ही अंग्रेजों की बर्बरता असर दिखा पाई। आजादी लाना उनका जुनून था और आजाद भारत सपना। घर-परिवार की चिंता किए बगैर वह अपने मिशन में लगे रहे। कुछ ऐसी ही शख्सियत थी खुखुंदू के विश्वनाथ राय की।

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महात्मा गांधी के सिद्धांतों को अपनाते हुए आंदोलनों में लाठी खाई तो बहरी सरकार की तंद्रा भंग करने के लिए चंद्रशेखर आजाद के रास्ते को भी अपनाने से पीछे नहीं हटे। कालकोठरी में रहकर भी उन्होंने सिर्फ आजाद भारत का ही सपना देखा। प्रयागराज विवि के लॉ छात्र विश्वनाथ राय नेशनल यूथ लीग की कार्यसमिति के सदस्य के रूप में 1930 में महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन से जुड़े।
 
युवाओं के जत्थे के साथ उन्होंने प्रयागराज के घंटाघर पर तिरंगा फहराने का प्रण किया था। इस मौके पर दो साथियों की शहादत ने उन्हें इस तरह झकझोरा कि अब तक बापू के अहिंसक आंदोलन को ही आजादी का सही रास्ता मानने वाले विश्वनाथ ने हथियार उठाने का निर्णय लिया। चंद्रशेखर आजाद के सानिध्य में पुलिस से बचते हुए वह दिन प्रतिदिन अंग्रेजी हुकूमत के लिए सिर दर्द बनते जा रहे थे।

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परिवार पर अंग्रेजों ने बरपाया था अपना कहर

परिवार पर अंग्रेजों ने उन्हें हाजिर कराने का दबाव बनाना शुरू किया। अंग्रेजों को इसमें सफलता भी मिली और आजादी के इस दीवाने को देवली (राजस्थान) के रेगिस्तानी इलाके की जेल में डाल दिया। क्रांतिकारी की पत्नी इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सकीं और अल्पायु में ही अपने दो वर्ष की इकलौती बिटिया इंदिरा को छोड़कर चल बसीं। बेटे व बहू के सदमे को उनके पिता भी बर्दाश्त नहीं कर सके। वह भी चल बसे।

इस दुखद मौके पर भी बंदी विश्वनाथ राय को अपने पिता के अंतिम क्रिया में शामिल होने का अवसर नहीं मिला। चंद्रशेखर आजाद की शहादत के बाद देवली जेल से आठ वर्षों के लंबे अंतराल के बाद वह पुन: चंद्रशेखर आजाद की सोशलिस्ट रिपब्लिक आर्मी के लिए सक्रिय रूप से कार्य करने लगे। अब अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें अपने लिए बड़ा खतरा मान लिया।

उनकी अनुपस्थिति में खुखुंदू स्थित उनके परिवार पर अंग्रेजों ने अपना कहर बरपाया। उनके घर में लूटपाट की। इस यातना से उनका परिवार गांव में ही दूसरों के घर में ही छिपकर रहने को विवश हो गया। यहां तक कि उनकी ससुराल उजियार घाट (बलिया) में उनके जज पद पर कार्यरत ससुर तक पर अंग्रेजों ने दबाव बनाया कि वो अपने क्रांतिकारी दामाद को समर्पण करा दें।

अंग्रेजों की यह युक्ति भी काम नहीं आई। लेकिन 1940 में विश्वनाथ राय आखिरकार एक बार फिर पकड़ लिए गए। इस बार उनके कारावास की अवधि छह वर्ष थी। इन छह वर्षों में उन्होंने खुखुंदू में अपनी धीरे-धीरे बड़ी हो रही बच्ची इंदिरा राय से पत्राचार करना शुरू कर उनमें भी पत्रों के माध्यम से देश प्रेम की भावना का संचार करते थे।

1940-46 के कारावास के दौरान ही विश्वनाथ राय जी का संपर्क उसी जेल में बंद जवाहर लाल नेहरू से हुआ। उनके विचारों से प्रभावित होकर विश्वनाथ राय ने पुन: गांधीवादी रास्ते पर चलने का निर्णय लिया। 1944 में कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली।
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25 वर्षों तक लगातार रहे सांसद

आजादी के बाद भी उनमें देश प्रेम की भावना में कमी नहीं आई। 1952 से 1977 तक लगातार लोकसभा के निर्वाचित संसद सदस्य रहने के बाद भी समाजसेवा को प्राथमिकता में रखा। शिक्षा के विस्तार में उन्होंने पैतृक गांव खुखुंदू में शिवाजी बाल विद्यालय शिवाजी इंटर कॉलेज की स्थापना की। पिता के सपनों को साकार करने के लिए उन्हीं के पद चिह्नों पर चलते हुए उनके दूसरे नंबर के सुपुत्र अजय शर्मा ने शिक्षा के क्षेत्र में विस्तार करते हुए डिग्री कॉलेज की स्थापना कराई।

वर्तमान में अजय शर्मा इन कॉलेजों के प्रबंधक हैं। 1906 में जन्मे क्रांतिकारी विश्वनाथ राय ईमानदार सांसद के रूप में 25 वर्ष के गौरवमयी जीवन जीते हुए आजाद भारत में 28 अगस्त 1984 को अपनी अंतिम सांस लेकर इस दुनिया से अलविदा हो गए। केंद्र में रही कांग्रेस सरकार ने स्वर्गीय राय के नाम से डाक टिकट भी जारी कराया है।

लोकप्रियता की बदौलत अशोक मेहता को दी थी मात
स्व. विश्वनाथ राय अपनी ईमानदारी और लोकप्रियता की बदौलत कांग्रेस पार्टी से 1962 के लोकसभा के आम चुनाव में राम मनोहर लोहिया के साथ सोशलिस्ट पार्टी के दूसरे नंबर के नेता कहे जाने वाले आर्थिक चिंतक अशोक मेहता को भारी मतों से देवरिया के सरजमीं पर चुनाव हराकर अपना लोहा मनवाया था।

स्व. राय ने एक अलग पहचान बनाई थी। उनके निधन के समय उनके बैंक खाते में 35 हजार रुपये थे। इसके अलावा उनके पास पिता द्वारा छोड़ी गई अचल संपत्ति के अलावा क्रय और अर्जित की गई कोई संपत्ति नहीं थी।
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