अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ा है हिंदी का महत्व
गोविवि में हिंदी विभाग के आचार्य प्रो प्रत्यूष दुबे ने कहा कि भूमंडलीकरण में व्यापार के कई देशों में फैलने की वजह से दुनिया के ग्लोबल विलेज में बदलने की बात कही जा रही है। ऐसे में भाषा और संस्कृति में भी ग्लोबल हो रही है। जिस प्रकार स्थानीय उत्पाद विश्व बाजार में जा रहे हैं उसी प्रकार भाषा भी विश्व स्तर पर पहुंच रही है। लोगों के बड़े पैमाने पर होने वाले विस्थापन के साथ उनकी संस्कृति, भाषा एवं साहित्य भी सुदूर देशों में जा रहा है। इन परिस्थितियों में हिंदी आज के समय में विश्व में महत्वपूर्ण स्थान बना रही है। विश्व राजनीति में भारत के बढ़ते प्रभाव, भारत के बड़े बाजार एवं भारत की युवा शक्ति के कारण व प्रवासी हिंदी साहित्य के रूप में हिंदी सुदूर क्षेत्रों में फैली है। उस साहित्य के माध्यम से विदेशों में भारतीय परंपरा एवं संस्कृति की पहचान बढ़ी है। आज विश्व हिंदी दिवस उसी पहचान एवं महत्व का परिचायक है। इसमें कोई शक नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी और भी महत्वपूर्ण भाषा के रूप पहचान बनाने जा रही है।
सरकारी और प्रशासनिक स्तर पर बदलना होगा दृष्टिकोण
साहित्यकार देवेंद्र आर्य ने कहा कि हिंदी भाषियों का बहुत बड़ा बाजार विश्व पटल पर मौजूद है। जाहिर है कि यह भाषाई उपनिवेश बड़ी कंपनियों की कमाई के लिए उर्वरक जैसा है, इसीलिए बाहर से ऐसा लगता है कि हिंदी भाषा वैश्विक स्तर पर बहुत प्रचार-प्रसार पा रही है लेकिन भीतर की वास्तविकता यह है कि वोट और मुनाफा के अतिरिक्त हिंदी की कोई अहमियत नहीं है। जिसकी पूर्ति के लिए सरकार और प्रशासनिक स्तर पर कुछ समय व कुछ राशि खर्च कर दी जाती है। अगर इन स्थितियों से उबरना है तो सरकारी और प्रशासनिक स्तर पर दृष्टिकोण में बदलाव लाना पड़ेगा।
उच्च न्यायालयों में भी हिंदी में होना चाहिए कार्य
साहित्यकार वेद प्रकाश पांडेय ने कहा कि राजभाषा हिंदी का स्मरण करते हुए इस बात से खुशी होती है कि वैश्वीकरण के कारण विश्व बाजार में हिंदी को विज्ञापनों के जरिए बढ़ावा मिल रहा है। हिंदी संवाद का माध्यम बन रही है। फिल्मों के जरिए उसकी लोकप्रियता बढ़ रही है। अनेक विश्वविद्यालयों में हिंदी में पठन-पाठन हो रहा है। लेकिन हिंदी के भविष्य को लेकर चिंता भी है। इसकी वजह यह है कि हिंदी अपने ही देश और प्रदेश में सिकुड़ती जा रही है। संघ लोग सेवा आयोग में जहां अंग्रेजी के साथ मातृ भाषाओं को माध्यम बनाया गया था, अब सिर्फ अंग्रेजी को महत्व दिया जा रहा है। इससे अभ्यर्थियों में अपनी मातृभाषा के प्रति सम्मान कम हो रहा है। देश के 25 उच्च न्यायालयों में से केवल चार में हिंदी में कार्य करने की छूट है। इसमें सुधार की जरूरत है।