उन्होंने बताया कि शॉकवेव इंट्रावास्कुलर लिथोट्रिप्सी तकनीक से मरीजों की जान बचाई गई है। मरीज का ब्लॉकेज दूर करके बिना चीरा के स्टेंट डाला गया है। यह तकनीक तेजी से बढ़ रही है।
डॉ. कुणाल सिंह ने बताया कि शॉकवेव तकनीक बेहद सरल और सुरक्षित है। इसमें दिल की धमनियों में जमा कैल्शियम हटाने के लिए मशीन का उपयोग किया जाता है। हाथ या पैर की नस से दिल की धमनियों में जाने वाला पतला सा तार होता है। इसी तार से धमनियों में जमे ब्लॉकेज के अनुसार ही झटका दिया जाता है। झटके में कैल्शियम टूटकर बिखर जाता है। यही तार धमनियों को फुलाता है। इस दौरान ब्लॉकेज किए हुए धमनियों में स्टेंट (छल्ला) डाले जाते हैं।
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डॉ. कुणाल ने बताया कि अभी सुपर स्पेशियलिटी में केवल ओपीडी चलाई जा रही है। हर दिन चार से पांच मरीजों को ओपीडी से ही भर्ती करना पड़ता है। अब तक 1100 से अधिक मरीजों में स्टेंट, एंजियोप्लास्टी और पेसमेकर लगाए जा चुके हैं। इनमें 50 फीसदी मामले युवाओं के हैं।
पिछले कुछ सालों से युवाओं में हार्ट अटैक के मामले बढ़े हैं। कोरोना के बाद इसमें ज्यादा तेजी आई है। यही वजह है कि युवाओं को सलाह दी जाती है कि वह छह माह पर एक बार हृदय की जांच कराते रहें।