फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

स्वास्थ्य अलर्ट: हल्का सा झटका और फिर दिल के दर्द से आराम, तकनीक से डॉक्टर कर रहे इलाज

Tue, 27 Jun 2023 03:48 PM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो गोरखपुर।

सार

शॉकवेव इंट्रावास्कुलर लिथोट्रिप्सी तकनीक की मदद से कोरोनरी आर्टरी डिजीज के एडवांस चरण वाले मरीज का भी इलाज करना संभव हो पाता है, जिनकी धमनी में कैल्शियम एकत्र होने के कारण हार्ड ब्लॉकेज बन जाता है।
विज्ञापन
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला।
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

दिल की धमनियों में जमे कैल्शियम की वजह से दर्द से परेशान हैं तो बस हल्का सा झटका झेलने को तैयार हो जाइए। अब इस मर्ज का इलाज धमनियों में जमे थक्के को मशीन के जरिए झटके से तोड़कर किया जा रहा है। इसे शॉकवेव इंट्रावास्कुलर लिथोट्रिप्सी तकनीक कहते हैं। यह तकनीक काफी सफल और आसान है। इसमें मरीजों को न तो चीरा लगाया जाएगा, न ही कैल्शियम को हटाने के लिए किसी बड़े इंजेक्शन का प्रयोग। इससे मरीज को दर्द से तुरंत राहत मिल जाती है।

विज्ञापन


इस तकनीक का इस्तेमाल बीआरडी मेडिकल कॉलेज के सुपर स्पेशियलिटी के हृदय रोग विशेषज्ञों ने दो मरीजों पर सफलतापूर्वक किया है। इस तकनीक से इलाज थोड़ा महंगा जरूर है, पर डॉक्टरों का दावा है कि इसे दिल की बीमारी को आसानी से ठीक किया जा सकता है। शॉकवेव इंट्रावास्कुलर लिथोट्रिप्सी तकनीक की मदद से कोरोनरी आर्टरी डिजीज के एडवांस चरण वाले मरीज का भी इलाज करना संभव हो पाता है, जिनकी धमनी में कैल्शियम एकत्र होने के कारण हार्ड ब्लॉकेज बन जाता है।

सुपर स्पेशियलिटी विभाग के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. कुणाल सिंह ने बताया कि यह तकनीक काफी सफल तो है लेकिन इलाज काफी महंगा है। इसमें इस्तेमाल होने वाली मशीनें बाहर से मंगानी पड़ती हैं। यह मशीन अभी न तो बीआरडी में है और न ही एसीजीपीजीआई में। एक मरीज पर करीब ढाई लाख रुपये का खर्चा आता है। जबकि सामान्य तौर पर एक स्टेंट डालने पर एक से डेढ़ लाख रुपये ही मरीजों के खर्च होते हैं।
विज्ञापन


इसे भी पढ़ें: पहली बार रोडवेज में होगी महिला चालकों की भर्ती, 24 माह के प्रशिक्षण के बाद होगी तैनाती

इस तरह किया जाता है तकनीक का इस्तेमाल

उन्होंने बताया कि शॉकवेव इंट्रावास्कुलर लिथोट्रिप्सी तकनीक से मरीजों की जान बचाई गई है। मरीज का ब्लॉकेज दूर करके बिना चीरा के स्टेंट डाला गया है। यह तकनीक तेजी से बढ़ रही है।

डॉ. कुणाल सिंह ने बताया कि शॉकवेव तकनीक बेहद सरल और सुरक्षित है। इसमें दिल की धमनियों में जमा कैल्शियम हटाने के लिए मशीन का उपयोग किया जाता है। हाथ या पैर की नस से दिल की धमनियों में जाने वाला पतला सा तार होता है। इसी तार से धमनियों में जमे ब्लॉकेज के अनुसार ही झटका दिया जाता है। झटके में कैल्शियम टूटकर बिखर जाता है। यही तार धमनियों को फुलाता है। इस दौरान ब्लॉकेज किए हुए धमनियों में स्टेंट (छल्ला) डाले जाते हैं।

इसे भी पढ़ें: गोरखपुर में मानसून के सौतेले व्यवहार से मायूसी, तीखी धूप व उमस ने किया बेहाल
विज्ञापन

रोजाना भर्ती होते हैं 20 से ज्यादा मरीज

डॉ. कुणाल ने बताया कि अभी सुपर स्पेशियलिटी में केवल ओपीडी चलाई जा रही है। हर दिन चार से पांच मरीजों को ओपीडी से ही भर्ती करना पड़ता है। अब तक 1100 से अधिक मरीजों में स्टेंट, एंजियोप्लास्टी और पेसमेकर लगाए जा चुके हैं। इनमें 50 फीसदी मामले युवाओं के हैं।

पिछले कुछ सालों से युवाओं में हार्ट अटैक के मामले बढ़े हैं। कोरोना के बाद इसमें ज्यादा तेजी आई है। यही वजह है कि युवाओं को सलाह दी जाती है कि वह छह माह पर एक बार हृदय की जांच कराते रहें।

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें