फर्जी काम करने वाले अपने व्यापार में बोगस फर्म का सहारा लेते हैं। इसके लिए ऑनलाइन ही खतौनी से खेत का कागज निकालते हैं। इसमें जमीन का क्षेत्रफल, मालिक का नाम उसके पते के साथ पूरी डिटेल होती है। इसी आधार पर धोखेबाज फर्जी तरीके से उक्त नाम को पहला पक्ष और खुद या अपने किसी परिचित को दूसरा पक्ष बनाकर किरायानामा तैयार कर लेते हैं।
इसी आधार पर उस पते पर अपने व्यवसाय का विवरण देते हुए वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) में पंजीकरण करवा लेते हैं। इसी फर्म के आधार पर बिना ई-वे बिल के ही खरीदारी करते और बेचते हैं। ऐसे में कर चोरी करते हुए सीधे लाभ लेते और सहयोगी व्यापारी को भी पहुंचाते हैं।
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एक मिनट के अंतराल पर बना दोनों किरायानामा
डिप्टी कमिश्नर ने बताया कि उक्त प्रपत्रों को लेकर 100 रुपये के स्टैंप पर ऑनलाइन किरायेनामे की सहमति बनती है। दोनों किरायानामा सीतापुर से बना था। इसके बनने में सिर्फ एक मिनट का ही अंतराल था। प्रपत्रों की जांच की गई तो यह तथ्य खुले।
50 हजार रुपये से अधिक की खरीदारी पर ई-वे बिल जरूरी
किसी भी व्यापार में 50 हजार रुपये से अधिक के सामान को खरीदते या बेचते वक्त ई-वे बिल बनना अनिवार्य होता है। इससे फर्म की खरीदारी और सालाना आर्थिक संग्रह का रिकार्ड जीएसटी के पास आ जाता है। लेकिन, बिना ई-वे बिल के सामान खरीदना जीएसटी के अपराध (कर अपवंचन) में आता है।