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Gorakhpur News: एनआईवी ने भी की देवरिया के मरीज में मंकी पॉक्स की पुष्टि

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नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी, पुणे से आई जांच रिपोर्ट
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26 अप्रैल को आबूधाबी से भारत लौटा था देवरिया का मरीज
लखनऊ से बस से पहुंचा गांव, बीआरडी मेडिकल कॉलेज में चल रहा है इलाज

गोरखपुर। बीआरडी मेडिकल कॉलेज के आइसोलेशन वार्ड में भर्ती देवरिया जिले का मरीज मंकीपॉक्स के ही संक्रमण से बीमार है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी पुणे से इसकी जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। इस मरीज का इलाज मंकीपॉक्स संक्रमण के प्रोटोकॉल के तहत ही किया जा रहा है।
देवरिया जिले के सलेमपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत बनकटा इलाके के पचरुखिया गांव निवासी 35 वर्षीय बीते साल 14 मई रोजगार के सिलसिले में दुबई गया था। पिछले सप्ताह आबूधाबी में उसे तेज बुखार के साथ शरीर पर चकत्ते होने लगे। स्थानीय अस्पताल में जांच कराई, जहां मंकीपॉक्स की आशंका जताई गई।
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मरीज की गंभीर स्थिति को देखते हुए आबूधाबी के डॉक्टरों ने भारत लौटने की सलाह दी। वहां के प्रशासन ने मरीज को भारत भेजा। 26 अप्रैल को यह युवक लखनऊ से अपने गांव पचरुखिया पहुंचा। उसके चार दिन बाद 30 अप्रैल को इसके बारे में देवरिया के स्वास्थ्य विभाग को खबर मिली और एंबुलेंस भेजकर मरीज को सरकारी अस्पताल लाने की व्यवस्था की गई। डॉ. अजीत पाल की निगरानी में मरीज को पुराने जिला अस्पताल के कमरे में भर्ती किया गया। बाद में हालत गंभीर होने पर बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर रेफर कर दिया गया। यहां से मरीज के ब्लड सैंपल को एनआईवी पुणे की लैब में भेजा गया था। मंगलवाार को रिपोर्ट में मंकीपॉक्स पॉजिटिव की पुष्टि हुई है। मरीज का इलाज मेडिकल कॉलेज में संक्रमण नियंत्रण प्रोटोकॉल के तहत किया जा रहा है।

अब तक दो बार हो चुकी है मंकी पॉक्स की पुष्टि
इस मरीज की इससे पहले भी एक बार जांच हो चुकी थी। विदेश से लौटने के दौरान जांच में मंकीपॉक्स की पुष्टि के बाद ही बीआरडी मेडिकल कॉलेज में उसका आइसोलेशन में रखकर इलाज शुरू किया गया था। आरएमआरसी के मीडिया प्रभारी डॉ. अशोक पांडेय ने बताया कि एनआईवी की जांच रिपोर्ट में पहले वाली रिपोर्ट की पुष्टि हुई है। अब तीसरी बार नमूना नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी) भेजी जाएगी।
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कोट
मरीज का इलाज विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में चल रहा है और उसकी स्थिति अब नियंत्रण में है। मरीज के नमूनों की जीनोम सीक्वेंसिंग की जा रही है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि उसकी बीमारी का असली कारण क्या है और कौन सा वायरस इसके लिए जिम्मेदार है। जीनोम सीक्वेंसिंग से न केवल बीमारी की पहचान संभव होती है, बल्कि आगे की चिकित्सा रणनीति भी तय की जा सकती है।

डॉ. हरीशंकर जोशी, निदेशक आरएमआरसी
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