गोरखपुर। पूर्वांचल में एमडीआर टीबी के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। दवा के कोर्स को बीच में छोड़ने की वजह से यह समस्या आ रही है। देश में औसत एमडीआर टीबी की तुलना में पूर्वांचल में करीब 20 प्रतिशत अधिक रोगी हैं। यह तथ्य दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राणी विज्ञान विभाग के सहायक आचार्य डॉ. सुशील कुमार, शोध छात्रा नंदिनी सिंह और बीआरडी मेडिकल कॉलेज के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. अमरेश कुमार सिंह के शोध में निकल कर सामने आए हैं। यह शोध ‘रिसर्च जर्नल ऑफ फार्मेसी एंड टेक्नोलॉजी’ के मार्च 2024 के अंक में प्रकाशित हुआ है।
डॉ. सुशील कुमार ने बताया कि शोध के तहत बीआडी मेडिकल कॉलेज के आईआरएल लैब में 498 मामलों की जांच की गई। इनमें से कुल 299 (60 प्रतिशत) नमूने पॉजिटिव पाए गए, उन्हें आगे एक अन्य परीक्षण लाइन प्रोब एसे के लिए चुना गया। इनमें से हमें 34 (11.7 प्रतिशत) मामले मिले, क्योंकि आइसोनियाज़िड नामक दवा से प्रतिरोधी थे। इनमें से 11 (4.2 प्रतिशत) ऐसे मामले थे जो एमडीआर टीबी के थे। इनसे पीड़ित मरीज सामान्य टीबी रोगियों की तुलना में कम उम्र के थे। एमडीआर टीबी के मरीजों की औसत आयु 33.8 वर्ष थी। सामान्य टीबी रोगियों की औसत आयु 36.8 वर्ष थी। देश में एमडीआर टीबी के मरीजों की संख्या 2.7 प्रतिशत है, जबकि पूर्वांचल में 3.5 प्रतिशत।
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नहीं काम कर रहीं दवाइयां
डॉ. सुशील के अनुसार टीबी की दवाइयां चार से छह महीने तक लगातार चलती हैं। इतने लंबे उपचार काल के दौरान मरीज अक्सर अपनी दवाइयां अधूरी छोड़ देते हैं। ये इस बीमारी के जीवाणु को दवा से प्रतिरोधी बना देता है। जीवाणु के अंदर पाए जाने वाले जीन्स में उत्परिवर्तन हो जाता है, जो दवाइयों को बेअसर कर देता है। उन्होंने बताया कि यदि हम टीबी उन्मूलन के लक्ष्य को पाना चाहते हैं तो हमें प्रयास करना होगा कि एमडीआर टीबी के मामलों की संख्या कम हो। इसके लिए अभी भी यह सुनिश्चित करना बहुत आवश्यक है कि लोग समय-समय पर दवाइयां लेते रहें।