गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी विशेषज्ञों का दो दिवसीय सेमिनार संपन्न, कई बीमारियों पर हुई चर्चा
गोरखपुर। गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी से जुड़ी बीमारियों पर दो दिवसीय सेमिनार में विशेषज्ञ डॉक्टरों ने हिचकी, क्रोंस डिजीज, सिलियक डिजीज और अल्सरेटिव कोलाइटिस जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की। सेमिनार के अंतिम दिन पीजीआई के गैस्ट्रो विभाग के डॉ. समीर मोहिंद्रा ने बताया कि हिचकी केवल गैस या एसिडिटी से नहीं बल्कि शरीर में सोडियम की कमी से भी आ सकती है।
रामगढ़ताल के किनारे एक होटल में चल रहे इस दो दिवसीय सेमिनार में डॉ. मोहिंद्रा ने कहा कि पसलियों के पास डायाफ्राम में टीबी होने या गैस्ट्रो-एसोफेजियल जंक्शन पर रिएक्शन भी हिचकी*का कारण बन सकता है। पेट में एसिड बढ़ने, दूध, चाय, कॉफी या कच्चे चने से एलर्जी के कारण भी कुछ लोगों को डकार और हिचकी की समस्या होती है।
मुंह में बार-बार छाले, हो सकती है क्रोन्स डिजीज
गैस्ट्रोइंट्रोलॉजिस्ट डॉ. ऋषभ गुप्ता ने बताया कि क्रोन्स डिजीज एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसका स्पष्ट कारण अभी पता नहीं है। यह मुंह से मलाशय तक फैल जाता है। इस वजह से बार-बार मुंह में छाले आना, दस्त, वजन कम होना, मलद्वार से खून निकलना, जोड़ों में दर्द और त्वचा पर रेशेज जैसे लक्षण देखे जाते हैं। यह बीमारी मुख्य रूप से 30 वर्ष से कम उम्र के युवाओं और 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में पाई जाती है।
बच्चों में एनीमिया और विकास रुकना संकेत है सिलियक डिजीज का
गैस्ट्रोइंट्रोलॉजिस्ट डॉ. उपेंद्र गुप्ता ने कहा कि यदि बच्चे की लंबाई नहीं बढ़ रही, बार-बार दस्त हो रहे हों, शरीर में खून की कमी और हड्डियों में दर्द रहता हो तो उसकी जांच सिलियक डिजीज के लिए करानी चाहिए। यह रोग गेहूं की एलर्जी से होता है और उत्तर भारत में अधिक पाया जाता है। हर 1000 में से दो बच्चे इस बीमारी से प्रभावित हैं।
अल्सरेटिव कोलाइटिस को समझ लेते हैं बवासीर
केजीएमयू के गैस्ट्रोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. सुमित रूंगटा ने बताया कि अल्सरेटिव कोलाइटिस में मरीज की आंतों में छाले बन जाते हैं और शौच में खून आता है। कई मरीज इसे बवासीर समझकर गलत इलाज कराते हैं। इस बीमारी का कारण अभी स्पष्ट नहीं है लेकिन यह रोग प्रतिरोधक क्षमता में असंतुलन से जुड़ी है। इसके मरीजों में गठिया, आंखों की लालिमा और वजन घटना जैसे लक्षण पाए जाते हैं।