गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पहले अध्यक्ष रहे रमाशंकर शुक्ल रसाल ने रीति कालीन काव्य पर विशेष कार्य किया। प्रो भगवती प्रसाद सिंह ने भक्तिकाल एवं प्रो रामचंद तिवारी ने हिंदी का महत्वपूर्ण गद्य साहित्य का इतिहास लिखा। नाटक एवं रंगमंच के क्षेत्र में प्रो गिरीश रस्तोगी ने हिंदी की पहचान देश स्तर पर बनाई। प्रो विश्वनाथ तिवारी साहित्य अकादमी के पहले अध्यक्ष रहे जो हिंदी भाषा के हैं। प्रो परमानंद श्रीवास्तव कविता के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पहचान बनाई। आजादी से पहले मन्नन द्विवेदी गजपुरी ने व्यंग शैली में रचनाएं लिखकर हिंदी साहित्य में विशिष्ट पहचान बनाई।
गोरखपुर विश्वविद्यालय के आचार्य प्रो प्रत्युष दुबे ने कहा कि हम अपनी विरासत को ठीक से पहचान लें तो बेहतर भविष्य एवं देश का निर्माण कर सकते हैं। हिंदी की मजबूत विरासत हमारे पास है। इससे प्रेरणा लेकर हिंदी को यथोचित सम्मान दिलाया जा सकता है। आज के समय में विज्ञान और प्रौद्योगिकी में हिंदी भाषा और उसके साथ ही देवनागरी लिपी के उचित प्रयोग की आवश्यकता है, ताकि हम अपनी भाषा और लिपि दोनों को बचा सकें।
साहित्यकार डॉ. फूलचंद प्रसाद गुप्त ने कहा कि हिंदी विश्व मंच पर प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कर चुकी है। अनेक विश्वविद्यालयों में हिंदी साहित्य का अध्ययन और अध्यापन हो रहा है। भारत में इसकी सर्वाधिक स्वीकार्यता है। यह जन मन की भाषा बन चुकी है। स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदी की अहम भूमिका रही। स्वतंत्र भारत में स्वावलंबन की आधारशिला और उस पर उन्नति का भव्य भवन हिंदी ने निर्मित किया। देश को आत्मनिर्भर बनाने में हिंदी की अहम भूमिका होगी।