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गोरखपुर एम्स: इस एक वजह से डॉ. सुरेखा पर हुई कार्रवाई, बेटे की तैनाती पड़ी भारी

Thu, 04 Jan 2024 10:54 AM IST
vivek shukla संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर।

सार

एम्स सूत्रों ने बताया कि परिसर के अंदर नर्सिंग हॉस्टल बनाया जाना था। ये काम एम्स की एक कार्यदायी संस्था की ओर से किया जाना था, लेकिन निदेशक ने इस काम को दूसरी फर्म से करवाने की निविदा निकाली दी। इसकी निविदा पांच करोड़ रुपये कर टेंडर फाइनल भी कर दिया।
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डॉ सुरेखा किशोर। (फाइल) - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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एम्स ऋषिकेस में तैनाती के समय कार्यकारी निदेशक डॉ. सुरेखा किशोर ने अपने बड़े बेटे की तैनाती कम्युनिटी एंड फैमिली मेडिसिन डिपार्टमेंट (सीएमएफएम) में करवाई थी। निदेशक गोरखपुर एम्स बनने के बाद उन्होंने बेटे की भी यहीं तैनाती करवा दी। छोटे बेटे की एमबीबीएस डिग्री पूरी करने के बाद इंटर्नशिप करने के दौरान ही एम्स गोरखपुर में नियुक्ति करवाई। यही उन्हें भारी पड़ा। यहीं से डॉक्टरों के एक धड़े ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। नर्सिंग हॉस्टल निर्माण में मनमर्जी और इसी बीच एक रविवार के दिन ओपीडी खोलने के आदेश ने तो कार्यकारी निदेशक के खिलाफ माहौल बना दिया।

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हालांकि, एम्स की कार्यकारी निदेशक के प्रभाव के चलते कोई खुलकर सामने नहीं आया। इसी बीच केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री, गोरखपुर हिंदुस्तान उर्वरक केंद्र के उद्घाटन के पहले निरीक्षण के लिए गोरखपुर आए थे। एम्स सूत्र ने बताया कि इसके लिए शनिवार को मीटिंग बुलाकर कार्यकारी निदेशक ने रविवार को ओपीडी शुरू करने की बात रखी। सभी चिकित्सकों ने इसपर असहमति जताई और तर्क दिया कि रविवार को एम्स की ओपीडी पहले दिल्ली एम्स में शुरू करवाएं। पूरे देश में किसी भी एम्स में रविवार को ओपीडी नहीं चलती है।

बैठक में सहमति बनी कि मंत्री को एम्स का निरीक्षण करवाया जाएगा। चिकित्सक ओपडी में बैठेंगे भी, लेकिन मरीज नहीं देखेंगे। इसी के बाद लगातार एक के बाद एक फैसलों से नाराज एम्स के ही विरोधी खेमे ने इनके सभी फैसलों और मनमाने तरीके से बेटों की तैनाती की शिकायत सीवीसी से कर दी।
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नर्सिंग हॉस्टल की भी पहुंच गई थी शिकायत
एम्स सूत्रों ने बताया कि परिसर के अंदर नर्सिंग हॉस्टल बनाया जाना था। ये काम एम्स की एक कार्यदायी संस्था की ओर से किया जाना था, लेकिन निदेशक ने इस काम को दूसरी फर्म से करवाने की निविदा निकाली दी। इसकी निविदा पांच करोड़ रुपये कर टेंडर फाइनल भी कर दिया। स्वास्थ्य मंत्रालय से इसकी भी शिकायत हो गई थी। सूत्रों ने बताया कि मंत्रालय की तरफ से पूछा गया का कि साढ़े तीन करोड़ रुपये में तैयार होने वाले प्रोजेक्ट को पांच करोड़ रुपये का किस आधार पर बनाया गया?

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छात्रावास के हॉस्टल 11 बजे तक खोलना भी पड़ा भारी
एम्स के अंदर छात्र और छात्राओं का हॉस्टल है। सूत्रों ने बताया कि एक संस्था की तरफ से यहां कुछ काम किया जा रहा था, जो रात 9 बजे तक चलता था। फर्म को लाभ देने के लिए देर रात 11 बजे तक हॉस्टल के खोले जाने की अनुमति दे दी गई थी। ये बात भी कार्यकारी निदेशक के लिए मुसीबत बन गई। आरोप है कि इसमें भी कुछ लापरवाही की गई थी।

कोरोना में रेड पेन चलाना भी बन गया मुसीबत
सूत्रों ने बताया कि एम्स के निदेशक के बेटों का हस्ताक्षर दूसरे लगाते थे। कोविड काल में एम्स के चिकित्सकों की ड्यूटी सुबह 9 बजे से थी। इस दौरान देर से मरीजों का इलाज कर अगले दिन एम्स पहुंचने पर अगर लेट हो जाता तो कार्यकारी निदेशक की तरफ से रेड पेन चलाकर उन्हें अनुपस्थित कर दिया जाता। इसके विरोध में भी एक खेमा तैयार हो गया था। उन्हें शिकायत थी कि अपने बेटों को इतनी छूट, लेकिन थोड़ी देर विलंब होने वाले चिकित्सकों को अनुपस्थित कर देना, तानाशाही है।

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गोरखपुर एम्स में बेटा अव्वल नंबर पर
एम्स के चिकित्सकों को एमबीबीएस कर इंटर्न करने के तत्काल बेटे का एम्स में नियुक्त होना खलने लगा था। डाॅ. शिखर किशोर वर्मा का चयन इंटरव्यू के आधार पर किया गया था। एक मार्च 2021 को चुने गए चार नाॅन एकेडमिक जूनियर रेजिडेंट मेडिकल की सूची में डाॅ. शिखर का नाम पहले स्थान पर था। इस नियुक्ति पर भी लोग अंदर-ही अंदर नाराज थे।
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