हलषष्ठी व्रत की पूजा करती माताएं।
- फोटो : अमर उजाला।
संतान की दीर्घायु के लिए माताएं बुधवार को हलषष्ठी व्रत रख विधि-विधान से भगवान बलराम की पूजा कीं। वाराणसी से प्रकाशित हृषीकेश पंचांग के अनुसार 17 अगस्त को षष्ठी तिथि का मान संपूर्ण दिन और रात्रि में 11 बजकर 52 मिनट तक है। इस दिन अश्विनी नक्षत्र भी संपूर्ण दिन और रात को दो बजकर 18 मिनट तक है। गंड योग और चंद्रमा की स्थिति मेष राशिगत होने से हलषष्ठी व्रत के लिए यह दिन पूर्ण प्रशस्त रहेगा।
हल से जुते हुए अनाज और सब्जियों का प्रयोग वर्जित
ज्योतिषाचार्य मनीष मोहन के अनुसार पुत्र की दीर्घायु के लिए हलषष्ठी व्रत किया जाता है। इस दिन बलराम जी की जयंती भी मनाई जाती है। इसे तिन छठी व्रत के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत माताएं संतान की लंबी आयु के लिए रखती हैं और व्रत के दौरान कोई अन्न नहीं ग्रहण करती हैं। हलषष्ठी व्रत में हल से जुते हुए अनाज और सब्जियों का प्रयोग वर्जित है। इस व्रत में वहीं वस्तुएं ग्रहण की जाती है जो तालाब या सरोवर में पैदा होती है या बिना जुते हुए भूमि में पाई जाती हैं। इनमें तिन्नी का चावल, कर्मुआ का साग आदि शामिल हैं। इस दिन गाय के किसी उत्पाद का प्रयोग नहीं होता है। भैंस का दूध, दही, घी का प्रयोग किया जाता है।
पूजा की विधि
पंडित बृजेश पांडेय के अनुसार इस दिन घर के बाहर भैंस के गोबर से षष्ठी माता का चित्र बनाएं। उसके पश्चात गणेश गौरी और बलराम जी की पूजा करें। एक छोटा सा गड्ढा बनाकर उसमें झरबेरी, पलाश और कुश का पेड़ लगाएं और वहीं बैठकर पूजा-अर्चना करें। व्रती हलषष्ठी व्रत की कथा सुनें। ऐसी मान्यता है कि षष्ठी देवी और भगवान बलराम जी की पूजा करने से उनके पुत्रों की आयु में वृद्धि होती है और वे स्वस्थ और निरोग रहते हैं।