आने वाली नस्लें तुमपर फख्र करेंगी हम असरों, जब ये खयाल आएगा उनको, तुमने फिराक को देखा था...। रघुपति सहाय उर्फ फिराक गोरखपुरी की कलम से निकलीं ये पंक्तियां उनके जाने के वर्षों बाद भी उनकी शख्सियत को बयां करती हैं। फिराक साहब को करीब से जानने वालों में शायद ही कुछ लोग बचे हों, लेकिन उनकी शायरी आज भी दुनिया के लोगों के जेहन में जिंदा है।
अदब की दुनिया के फनकार कहे जाने वाले फिराक गोरखपुरी का नाम देश-दुनिया के तमाम साहित्य प्रेमियों के बीच बड़े अदब से लिया जाता है। लेकिन हुक्मरानों और अफसरानों की उदासीनता के कारण बनवारपार स्थित उनका पैतृक आवास पिछले वर्ष बारिश में ढहकर जमींदोज हो चुका है।
गोला तहसील क्षेत्र के बनवारपार निवासी मुंशी गोरख प्रसाद इबरत के पुत्र के रूप में 28 अगस्त 1896 में फिराक गोरखपुरी का जन्म हुआ था। उनके पिता पेशे से वकील भले ही थे, लेकिन शायरी में उनका अच्छा दखल था। बचपन का बड़ा हिस्सा बनवारपार में गुजारने के बाद फिराक ने इलाहाबाद (अब प्रयागराज) विश्वविद्यालय से पढ़ाई मुकम्मल की। वर्ष 1930 में अंग्रेजी साहित्य से एमए करने के बाद वहीं 1930 से 1959 तक अंग्रेजी शिक्षक की जिम्मेदारी संभाली।
अंग्रेजी पढ़ने व पढ़ाने वाले फिराक ने न सिर्फ कालजयी रचनाओं के लिए ज्ञानपीठ, पद्मभूषण, साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई सम्मान हासिल किए बल्कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की भूमिका निभाते हुए आने वाली नस्लों को मनन करने के लिए बहुत कुछ छोड़ गए। फिराक साहब तीन मार्च 1982 को दुनिया से रुखसत हो गए।