केस-1
सिद्धार्थनगर निवासी जय प्रकाश ने बताया कि भरा-पूरा परिवार है मेरा। पत्नी भी स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत थीं। बेटा प्राइवेट नौकरी करता था। आठ महीने पहले मुझे क्यों वृद्धाश्रम छोड़ आया पता नहीं। पता करना भी नहीं है। बस एक ही प्रार्थना है कि बेटा-बहू और पत्नी जहां भी हों। कुशल रहे। बेटे का चेहरा देखने की इच्छा होती है।
केस-2
राम जानकी नगर निवासी कुंज बिहारी ने कहा करोड़ों की संपत्ति थी। बेटा बस चलवाता है। कभी कोई कमी नहीं महसूस हुई। जब तक ताकत थी खुद भी मेडिकल स्टोर का संचालन करता था। मगर जैसे ही ताकत गई, अपनों ने मुंह मोड़ लिया। घर वालों ने वृद्धाश्रम में छोड़ दिया। अब किसी से कोई शिकायत नहीं रही। बेटे की चिंता रहती है।
केस - 3
बड़हलगंज निवासी गुलाब चंद ने बताया कि दो बेटा और एक बेटी है। सभी की शादी हो गई। सब्जी बेचकर जीवन यापन करता था। जितना बन पड़ता था मेहनत कर परिवार का पालन-पोषण करने में जुटा रहा। मगर जैसे ही उम्र, मेहनत में बाधा बनने लगी, सभी ने मुंह मोड़ लिया। शायद मैं बोझ बन गया। अब तो यह आश्रम ही मेरा परिवार है। एक ही चाह है कि बच्चे जहां रहें, खुश रहें।