बीपी के मरीजों को भी खतरा
डॉ. राम कुमार ने बताया कि यह खतरा केवल गर्भवतियों को ही नहीं है, बल्कि बीपी के मरीजों को भी यह बीमारी हो सकती है। जिन मरीजों को शुगर के साथ बीपी है, उन्हें तो हर दो से तीन माह पर आंखों की जांच कराते रहना चाहिए। ऐसा न करने पर उनके आंखों की रोशनी कभी भी जा सकती है।
प्रसव के दौरान बीपी का नियंत्रण सबसे अहम
बीआरडी मेडिकल कॉलेज की स्त्री एवं प्रसूति रोग विभागाध्यक्ष डॉ. वाणी आदित्य ने बताया कि प्रसव के दौरान बीपी का नियंत्रण सबसे अहम है। अगर बीपी नियंत्रित नहीं है, तो सामान्य और सिजेरियन प्रसव नहीं कराया जाता। हाई बीपी की वजह से गर्भवतियों को प्रीक्लैंप्सिया के साथ, शरीर के अन्य हिस्सों से भी खून आ जाता है। इसके अलावा गर्भ में पल रहे बच्चे के मष्तिस्क पर भी इसका दुष्प्रभाव दिखता है। यही वजह है कि सलाह दी जाती है कि बीपी और शुगर की जांच समय-समय पर गर्भवती जरूर कराएं।