- अस्पताल और क्लीनिक का पंजीकरण हर वर्ष होता है। स्वास्थ्य विभाग ध्यान दे कि एक डॉक्टर के नाम से केवल एक ही संस्थान पंजीकृत किया जाए।
- डॉक्टर अपनी डिग्री बेचकर कहीं और रह रहे हैं तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।
- पंजीकरण के बाद अस्पताल में डॉक्टर का नाम, डिग्री, पंजीकरण नंबर, बैठने का समय और फोन नंबर लिखा हो।
- लिस्ट में 80 प्रतिशत ऐसे अस्पतालों के नाम हैं, जिसे झोलाछाप, एंबुलेंस ड्राइवर, प्रॉपर्टी डीलर और अन्य असामाजिक तत्व चला रहे हैं। ऐसे अस्पतालों की नियमित जांच की जाए कि आखिर कौन डॉक्टर बैठता है।
- प्रधानमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना के लाभार्थियों का ऑपरेशन गांव और झोलाछाप के यहां हो रहा है। इसमें सुनिश्चित किया जाए कि ऑपरेशन के दौरान चिकित्सक की फोटो जरूर ली जाए।
सीएमओ डॉ. आशुतोष कुमार दुबे ने कहा कि 153 डॉक्टर करीब 400 से अधिक अस्पतालों का संचालन कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी इनके नाम पर अस्पताल पंजीकृत हैं। झोलाछाप मरीजों को लेकर आने-जाने का काम करते हैं। अगर एक से अधिक डॉक्टर के नाम से अस्पताल का पंजीकरण है तो सभी झोलाछाप खुद ही सामने आ जाएंगे और उनकी दुकानदारी बंद हो जाएगी। मामले की जांच चल रही है।
सीएमओ ने एक से ज्यादा नर्सिंग होम (अस्पतालों) में अपना पंजीकरण कराने वाले डॉक्टरों को नाम वापस लेने के लिए 15 दिन का समय दिया है। साथ ही निर्देश दिया है कि अगर 15 दिनों में आवेदन नहीं मिले तो स्वास्थ्य विभाग नर्सिंग होम से डॉक्टर का पंजीकरण निरस्त करेगा। साथ ही कानूनी कार्रवाई भी करेगा। इस चेतावनी के बाद गत शनिवार को सीएमओ कार्यालय में सात डॉक्टरों ने दूसरे नर्सिंग होम से नाम वापस लेने के लिए आवेदन किया था।
इस वजह से है विवाद
भटहट के सत्यम नर्सिंग होम में डॉक्टर सुनील कुमार सरोज की ओर से किराये पर डिग्री दी गई थी। डिग्री देने के बाद इलाज एक झोलाछाप करता था। इस दौरान एक गर्भवती की जान चली गई थी। इस मामले की जांच शुरू हुई तो पता चला कि 153 डाक्टर ऐसे हैं, जिनके नाम 355 नर्सिंग होम, डायग्नोस्टिक सेंटर और क्लीनिक चल रहे हैं। सभी ने पूर्णकालिक के रूप में अपना पंजीकरण कराया है। किसी के नाम सात, तो किसी के नाम पर पांच-पांच अस्पताल पंजीकृत हैं। नियम के अनुसार एक डॉक्टर दो अस्पताल पर पंजीकरण करा सकता है। दोनों अस्पतालों की दूरी 30 किलोमीटर के अंदर होनी चाहिए।