दवा विक्रेता दिलीप सिंह कहते हैं कि आम आदमी को इस मामले में जागरूक करना बहुत जरूरी है। फुटकर दुकानों पर हर दिन ऐसे लोग आते हैं जो बिना पर्चा के दवा लेते हैं। यह स्थिति केवल खांसी-सर्दी के सिरप ही नहीं, अन्य रोग के लिए भी हानिकारक है। सोशल मीडिया पर दवाओं का नाम और प्रभाव पढ़कर दवा खरीदने की आदत बड़े खतरे का कारण बन सकती है। मेडिकल स्टोर संचालकों को चाहिए कि बिना पर्चा के दवाएं न दें।
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बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. डीके सिंह कहते हैं कि मर्ज के परीक्षण के बाद ही दवा की डोज निर्धारित की जा सकती है। छोटे बच्चे अधिक संवेदनशील होते हैं, इसलिए दवाओं का रिएक्शन भी उनमें अधिक होता है। इसलिए बच्चों को बिना डॉक्टर से परामर्श लिए दवा नहीं दी जानी चाहिए। कई बार हमें दवा के कुप्रभाव का तत्काल पता नहीं चलता, लेकिन बच्चों को इसका असर जीवन के अगले चरणों में भी झेलना पड़ सकता है। इसके अलावा एफडीसी को चार साल से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रतिबंधित किया गया है, इसलिए इसका विशेष ख्याल रखना चाहिए।