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अनंत है भगवान की कथा, कभी नहीं होती समाप्त : राजेंद्र दास

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- गोरखनाथ मंदिर में साप्ताहिक श्रीमद्भागवत कथा के विश्राम पर उमड़े श्रद्धालु
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- कथा वाचक ने कहा सब कुछ भगवान का है हृदय से स्वीकार कर लेना चाहिए
- कथा विश्राम पर श्रद्धालुओं ने ग्रहण किया प्रसाद



गोरखपुर। कथा व्यास वृंदावन से पधारे जगद्गुरु स्वामी राजेंद्र दास देवाचार्य ने व्यास पीठ से श्रीमद्भागवत कथा के विश्राम पर श्रद्धालुओं को कथा सुनाते हुए कहा कि भगवान की कथा अनंत है, यह कभी समाप्त नहीं होती। भगवान की कथा सुनने से मनुष्य के भीतर भक्ति और श्रद्धा का भाव जागृत होता है।

ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 57वीं तथा राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ की 12वीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित साप्ताहिक श्रीमद्भागवत कथा का मंगलवार को पूर्णाहुति के साथ समापन हुआ। कथावाचक ने कहा कि गोरखपुरवासियों के लिए यह भगवान की परम कृपा है कि भगवान की प्रेरणा से हनुमान प्रसाद पोद्दार, स्वामी रामसुखदास, राधा बाबा तथा जयदयाल गोयनका जैसे परम संतों ने गोरखपुर में साधना की। भगवत्कृपा से यहां गीता प्रेस और कल्याण जैसी पवित्र धार्मिक पत्रिका के माध्यम से सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति का महान कार्य हुआ।
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उन्होंने कहा कि गोरखपुर साक्षात शिवावतार गुरु गोरखनाथ की तपस्थली है। इसलिए यह कोई सामान्य स्थान नहीं, बल्कि परम पवित्र तीर्थ है। संसार में ज्ञान से पवित्र कोई वस्तु नहीं है। उपनिषदों की श्रुति ज्ञान को साक्षात ब्रह्मस्वरूप बताती है। अखंड ज्ञान केवल भगवान में ही है और ज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि तीर्थों में गंगासागर को श्रेष्ठ तीर्थ माना गया है और पुराणों में वहां 99 करोड़ तीर्थों के निवास का वर्णन मिलता है।

कथा वाचक ने कहा कि संपूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्रीज्ञान और वैराग्य इन छह प्रकार के ऐश्वर्य का पूर्ण स्वरूप भगवान में निवास करता है। भगवान हमारे शरण हैं और हम भगवान के शरणागत हैं, यह भाव दृढ़ता से हृदय में स्थापित कर लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि व्याकरण का अध्ययन आवश्यक है, किंतु व्याकरण पढ़ा हुआ व्यक्ति यदि न्याय दर्शन का अध्ययन नहीं करता तो उसे बाल कहा जाता है। न्याय दर्शन के अध्ययन से बुद्धि तीक्ष्ण होती है। शब्द वायु रूप होते हैं, किंतु जब वही शब्द किसी संत के मुखारविंद से निकलते हैं तो वे केवल वायु रूप नहीं रहते, बल्कि भगवान के चरण कमलों की सुगंध से युक्त हो जाते हैं। इस सुगंध का अनुभव नाक से नहीं, बल्कि कानों के माध्यम से होता है। संतों की वाणी सुनने से श्रोता का हृदय भगवान के चरण कमलों की सुगंध से भर जाता है और वहां भगवान का निवास हो जाता है।

उन्होंने कहा कि जिस दिन हम हृदय से स्वीकार कर लेंगे कि यह तन-मन और यह संसार सब भगवान का है, उसी दिन से हम स्वयं भी कोई अनुचित कार्य नहीं कर सकेंगे। भगवान प्रेम के भूखे हैं और उन्हें अनन्य प्रेम से ही जीता जा सकता है। कथा वाचक ने कहा कि कल्याण का मूल उद्गम भक्ति है और भक्ति भागवत चरित्र के श्रवण से उत्पन्न होती है। उन्होंने कहा कि शत्रुघ्न जी लक्ष्मण जी से छोटे हैं, किंतु भागवत धर्म में उनसे बड़े हैं, क्योंकि वे भगवान श्रीराम के साथ रहने के बजाय भगवान के परम भक्त भरत जी के साथ रहते हैं। भगवान के साथ रहना सरल है, किंतु भगवान के भक्त के साथ रहना कठिन है।

श्रद्धा भगवान की कथा से उत्पन्न होती है। श्रद्धा से रति और रति से भक्ति उत्पन्न होती है। जब हमारा मन भगवान के अनुराग में डूब जाता है, तब सांसारिक भोग वमन के समान प्रतीत होने लगते हैं और इंद्रियां विषयों से हटकर भजन के लिए आतुर हो जाती हैं। गुरु ही साक्षात परम ब्रह्म हैं और गुरु के प्रति निष्ठा से ही भगवान की प्राप्ति होती है।

कथा का समापन आरती एवं प्रसाद वितरण के साथ हुआ। कथा की पूर्णाहुति के अवसर पर रोहतक, हरियाणा से पधारे महंत बालक दास, जगद्गुरु स्वामी राम दिनेशाचार्य, वाराणसी से पधारे जगद्गुरु स्वामी डॉ. रामकमलदास वेदांती, सिंचाई एवं जलशक्ति मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह, पुष्पदंत जैन, विधायक विपिन सिंह सहित अनेक संत-महात्मा एवं श्रद्धालु प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।
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- भगवान की शरण में रहने का भाव जरूरी
स्वामी राजेंद्र दास देवाचार्य ने कहा कि मनुष्य को यह भाव अपने हृदय में दृढ़ करना चाहिए कि भगवान ही उसके शरण हैं और वह भगवान का शरणागत है। जब यह भाव मन में स्थायी हो जाता है तो जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदलने लगता है। उन्होंने कहा कि तन, मन और संसार में हमारा अपना कुछ भी नहीं है। जिस दिन मनुष्य इसे हृदय से स्वीकार कर लेता है, उसी दिन से अनुचित कार्यों से उसका मन हटने लगता है।
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