लार। नगर में जन्माष्टमी व डोल मेले की परंपरा अंग्रेजी हुकूमत काल से चली आ रही है। इसकी शुरुआत चौक वार्ड के स्वर राधारमण सिंह ने 1918 में की थी। अब यह परंपरा आज की युवा पीढ़ी मजबूती के साथ निभा रही है। झांकी और बाजार के बीच में डोल जुलूस का मिलन आरती के बाद मेले का समापन होता है। इस दौरान नगर का माहौल भक्तिमय हो जाता है।
नगर में जन्माष्टमी का त्योहार परंपरागत तरीके से मनाया जाता है। इसकी शुरुआत 1918 में स्वर राधा रमण सिंह ने की थी। तभी से जन्मोत्सव कार्यक्रम के बाद अगली सुबह डोल जुलूस निकाला जाता है। इसमें घारी वार्ड, चनुकी मोड़, पिपरा चौराहा सहित 24 से अधिक स्थानों पर रखे डोल मेले में आते हैं। सभी मुख्य चौराहा से एकत्रित होकर धीरे धीरे गाजे बाजे और जय श्रीकृष्ण के जय घोष करते हुए आगे बढ़ते हैं। भगवान की मनोरम झांकी भी प्रस्तुत करते हैं। इस दौरान घरों की छतों से लोग फूल बरसा डोल जुलूस का स्वागत करते हैं। शाम को सभी डोल कतारबद्ध तरीके से स्वर राधा रमण सिंह के दरवाजे पर पहुंचता है, जहां उनके परिजनों द्वारा भगवान की आरती कर समापन किया जाता है। इस दौरान दरवाजे पर पहुंचे लोगों को जलपान कराया जाता है। इसके अलावा बेहतर झांकी प्रदर्शन पर पुरस्कृत किया जाता है।
अब युवा पीढ़ी कर रही परंपरा का निर्वहन
सदियों से यह परंपरा चली आ रही है। हमें पूर्वजों से यह विरासत में मिली है। जन्माष्टमी का पर्व हम सभी के लिए काफी महत्व रखता है। परंपरा को निभाना हमारी जिम्मेदारी है।
-देवेंद्र सिंह राजू
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जन्माष्टमी त्योहार को लेकर मन में काफी उत्साह है। इसकी तैयारी सभी के सहयोग से पूर्ण कर ली गई है। डोल मेला इस बार भी ऐतिहासिक होगा। यह हमारी धरोहर बन चुकी है।
-अमित सिंह,अंशु
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लार का डोल जुलूस ब्रिटिश काल से निकलता है। ऐसी परंपरा कहीं देखने को नहीं मिलती है। पूरे एक वर्ष तक इस त्योहार का इंतजार रहता है।
-कौशलेंद्र प्रताप सिंह, भोला
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इस त्योहार को लेकर दस दिनों पहले से तैयारी शुरू कर दी जाती है। बड़े बुजुर्ग सभी एक साथ होते हैं। पूरे लार इलाके में उत्सव जैसा माहौल शुरू हो गया है।
-डब्बू सिंह