केस तीन: लहसड़ी में भूमि का मामला राम आसरे और जीतन के बीच लंबित है। दो साल पूर्व जीतन ने राम आसरे से भूमि खरीदी। इस नाम चढ़ाते समय खरीदने वाले जीतन के नाम की जगह राम आसरे हो गया। जानकारी होने पर पीड़ित ने वाद दाखिल किया। तभी से मामला लंबित चल रहा है।
नाम में गड़बड़ी पर हुए थे परेशान
केस चार: गुलरिहा क्षेत्र के रविंद्र कुमार चौहान से भूमि खरीदी थी। वर्ष 2022 के दिसंबर माह में उन्होंने जब खतौनी निकाली तो उनके नाम के आगे चौहान की चैहान हो गया। इस त्रुटि को सुधारने के लिए उनको काफी परेशान होना पड़ा।
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इस तरह की सामने आती गड़बड़ी
नाम का डाटा फीड करते समय कंप्यूटर पर अक्षरों में गलती की जाती है। जैसे किसी का नाम कमल है तो उसकी जगह कमला लिख दिया जाएगा। इसकी खतौनी निकालने पर नाम के गलत या सही होने की जानकारी होगी।
ये भी त्रुटि की जाती है
- पति के नाम की जगह पिता दर्ज कर देते हैं।
- क्रेता की जगह विक्रेता और विक्रेता की जगह क्रेता का नाम चढ़ा देते हैं।
- भूमि की गाटा संख्या, चौहद्दी सहित अन्य चीजों में गड़बड़ी होती है।
किसी बैनामे के खारिज-दाखिल के बाद नाम में होने वाली लिपिकीय त्रुटि सहित अन्य गड़बड़ी को दूर करने की कानूनी प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। इसके लिए त्रुटि संशोधन (करेक्शन ऑफ पेपर) आवेदन करना पड़ता है। इसे तहसीलदार के दफ्तर में जमा कराया जाता है। फिर इस पर रिपोर्ट लगाकर यह कानूनगो और लेखपाल के पास जाती है। लेखपाल की रिपोर्ट लगाकर प्रक्रिया के तहत दोबारा जब फाइल लौटती है, तब इस पर तहसीलदार आदेश करते हैं।
तहसील से जुड़े लोगों का कहना है कि कई बार लेखपाल के स्तर से रिपोर्ट नहीं लगाई जाती है। संशोधन के लिए 45 दिन की समय सीमा तय है, बावजूद इसके महीनों गुजर जाते हैं। अनुचित लाभ के चक्कर में ऐसी फाइलों को रोका जाता है।
इन सवालों से घेरे में लिपिकीय त्रुटि
किसी भी भूमि की रजिस्ट्री के दौरान कई प्रक्रिया अपनाई जाती है। क्रय और विक्रय करने वाले दोनों पक्ष अपने मूल दस्तावेजों के साथ निबंधक से संपर्क करते हैं। किसी अधिकृत अधिवक्ता से भूमि से संबंधित कागजात बनवाते हैं। दस्तावेज के रूप में दोनों पक्षों के पहचान पत्र, फोटो पहचान पत्र, निवास प्रमाण पत्र, पासपोर्ट साइज फोटो इत्यादि देते हैं।
बैनामा के बाद दाखिल खारिज का आदेश डेढ़ माह बाद होता है। इस आदेश के बाद खतौनी के लिए कंप्यूटर में डाटा फीड किया जाता है। सभी आवश्यक प्रमाण पत्र और सही आदेश के बावजूद नाम गलत होने को लेकर बार - बार होने वाली लिपिकीय त्रुटि सवाल उठते हैं। एक बार गड़बड़ी होने पर आवेदक को बार-बार चक्कर लगाना पड़ता है। इसमें समय के साथ-साथ लोगों रुपये भी खर्च होते हैं।