कलाकार घरों के लिए बना रहे मूर्तियां।
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'साहब 50 सालों से मूर्तियां बना रहा हूं लेकिन ऐसा दिन कभी नहीं देखा था जो ये कोरोना दिखा रहा है।' कोरोना ने हमसे हमारा रोजगार ही छीन लिया है। यह कहना है, गोरखपुर शहर के एक स्थानीय मूर्तिकार की। जो यह सोचकर परेशान है कि संकट की इस घड़ी में उसकी सालभर की रोजी-रोटी कैसे चलेगी? क्योंकि वह दुर्गापूजा में जो मूर्तियां बनाता था उसी कमाई से उसके परिवार का सालभर का खर्चा चलता था।
शहर के बक्शीपुर, आर्यनगर, पादरी बाजार, गोरखनाथ आदि स्थानों पर स्थानीय मूर्तिकार दुर्गापूजा के लिए प्रतिमाएं बनाकर उससे हुई कमाई से सालभर अपने परिवार का पालन-पोषण करते थे। लेकिन कोरोना संकट के बीच इस बार दुर्गा पंडालों में होने वाली प्रतिमा स्थापना को लेकर संशय है। क्योंकि इसको लेकर अभी तक शासन की कोई गाइडलाइन जारी नहीं हुई है। ऐसे में कलाकारों को समितियों से मूर्तियों के ऑर्डर नहीं मिल रहे हैं। कई कलाकार घरों के लिए छोटी मूर्तियां बना रहे हैं लेकिन उनका कहना है कि इससे इनका गुजारा होने वाला नहीं है।
मूर्तिकार गोपाल दत्त तिवारी ने बताया कि हर बार छोटी बड़ी लगभग 50 मूर्तियों को बनाता था। इस बार अब तक चार-पांच मूर्तियों के ऑर्डर मिले हैं वह भी सभी घरों में रखने के लिए सिर्फ छोटी मूर्तियों की। ऐसे में हम लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
मूर्तिकार अशीष प्रजापति ने बताया कि कोरोना का असर दुर्गापूजा के काम पर पड़ रहा है। समितियों से मूर्तियों के ऑर्डर नहीं मिल रहे हैं। कुछ छोटी मूर्तियों का निर्माण किया है लेकिन मूर्तियों के खरीदार नहीं पहुंच रहे हैं। ऐसे में अब पूंजी डूबने का डर सताने लगा है।
मूर्तिकार नीतू प्रजाजति ने बताया कि हर साल दशहरे के लिए ससुराल से आकर मायके में मूर्ति बनाने का काम करती हूं। जिससे की कुछ अतिरिक्त आय हो सके। लेकिन इस बार कोरोना के कारण मूर्तियों के ऑर्डर नहीं है जिससे हमारे पास काम ही नहीं है।