मुख्यमंत्री ने प्राधिकरण में अवैध निर्माण के नाम पर हो रहे खेल, परियोजनाओं की खराब प्रगति, पार्कों के विकास और ट्रैफिक कंट्रोल में कोई सार्थक पहल नहीं कर पाने पर गोरखपुर समेत कई प्राधिकरणों पर नाराजगी जताई है। उन्होंने गोरखपुर मंडल के कमिश्नर व जीडीए के अध्यक्ष जयंत नार्लिकर को सप्ताह भर के भीतर इन सभी बिंदुओं पर समीक्षा कर रिपोर्ट तैयार करने को कहा है।
इसे मुख्यमंत्री कार्यालय के साथ ही प्रमुख सचिव आवास विकास को भी उसे उपलब्ध कराना होगा, ताकि जिम्मेदारी तय की जा सके। कमिश्नर ने 21 दिसंबर को इस संबंध में प्राधिकरण के सभी अफसरों की बैठक बुलाई है। निर्देश दिया है कि प्रत्येक परियोजना, अवैध निर्माण आदि से जुड़ी पूरी रिपोर्ट के साथ अफसर बैठक में उपस्थित होंगे।
1700 एकड़ विनियमितिकरण की जमीन भी बड़ी समस्या
अवैध निर्माण के लिए जीडीए के अभियंता और अफसर तो जिम्मेदार हैं ही, प्राधिकरण क्षेत्र में आने वाली करीब 1700 एकड़ विनियमितीकरण की जमीन भी बड़ी वजह है। यहां हजारों मकान खड़े हो गए हैं। वर्तमान महायोजना 2021 में करीब 20 फीसदी एरिया को विनियमित क्षेत्र घोषित कर दिया गया था। यहां मानचित्र नहीं स्वीकृत हो सकते।
अभियंताओं और अफसरों की लापरवाही से इस विनियमित क्षेत्र में पिछले ढाई दशक में 12 हजार से अधिक निर्माण हो गए हैं। ये वर्तमान में कुल 22 हजार अवैध निर्माण के आधे से भी अधिक हैं। इनमें कुछ कॉलोनियां तो ग्रीन लैंड पर बस गई हैं। ये अवैध निर्माण जीडीए के लिए मुसीबत बन गए हैं। जीडीए अब अगर इन अवैध निर्माण के खिलाफ सख्ती करना भी चाहे तो कार्रवाई आसान नहीं होगी। मोहल्ले के मोहल्ले जमींदोज करने पड़ेंगे।
प्रदेश में अवैध निर्माण के मामले में दूसरे पायदान पर रहने का दाग, गोरखपुर के माथे से नई महायोजना में धुलने की उम्मीद है। प्राधिकरण नई महायोजना 2031 में इसके समाधान में जुटा है। महायोजना 2031 में विनियमित क्षेत्र में बने घरों के मानचित्र भी स्वीकृत किए जाने का प्रावधान की तैयारी चल रही है। जनवरी तक इस महायोजना के पूरा होने की उम्मीद है।
60 फीसदी मानचित्र के आवेदन रद्द करने पर बैठ चुकी है जांच
करीब चार साल पहले प्रदेश में सबसे ज्यादा अवैध निर्माण के साथ ही जीडीए द्वारा मानचित्र के सबसे ज्यादा 60 फीसदी आवेदन निरस्त करने के मामले में शासन ने एक जांच कमेटी गठित की थी। कमेटी के सदस्यों ने दो दिन यहां रहकर मामले की जांच की। जांच में पाया गया था कि विनियमितीकरण क्षेत्र के ज्यादातर आवेदन आने की वजह से निरस्त होने वाले आवेदनों की संख्या अधिक है। इस मामले में जीडीए को शासन की तरफ से उस समय राहत मिल गई थी।
मानचित्र स्वीकृत करने में देरी और पेंच भी बड़ी वजह
साल भर पहले ही शासन की तरफ से मानचित्र स्वीकृत करने के तय समय को लेकर सख्ती की गई, वर्ना इसके पहले मानचित्र के लिए आवेदकों को छह-छह महीने दौड़ाया जाता था। मानचित्र के नाम पर अभियंता वसूली करते थे। यह भी एक बड़ी वजह है कि आम आदमी चाहकर भी मानचित्र स्वीकृत कराने से कतराता है। पिछले छह महीने से तो ऑनलाइन आवेदन के लिए बनी वेबसाइट में ही तकनीकी दिक्कत से तमाम आवेदक परेशान हैं। पुरानी वेबसाइट बंद हो जाने से मानचित्र स्वीकृत होने के बाद भी 70 से अधिक लोग शुल्क जमा करने के लिए महीनों से दौड़ लगा रहे हैं।
मानचित्र स्वीकृत कराने के लिए घूस लेते पकड़ी जा चुकी है महिला कर्मी
मानचित्र के नाम पर घूस लेते प्राधिकरण की एक महिला कर्मचारी को पिछले साल एंटी करप्शन की टीम ने रंगो हाथ पकड़ा था। पूर्व उपाध्यक्ष अन्नावि दिनेश कुमार के निर्देश पर ही यह कार्रवाई हुई। कुछ अभियंताओं के भी नाम आए थे। यही नहीं विभिन्न मामलों में जीडीए दफ्तर से फाइलें गायब होने पर भी अब तक दो-तीन मुकदमे दर्ज हो चुके हैं।
जीडीए ने करीब तीन महीने पहले ही सर्वे कर 153 अवैध कॉलोनियों की सूची तैयार की थी। प्राधिकरण ने रेरा को सूची भी भेज दी, मगर अभी कोई कार्रवाई नहीं हुई। वहीं, जीडीए को भी संबंधित अभियंताओं पर कार्रवाई करनी थी। वह भी नहीं हुई। हर बार ऐसा ही होता है।
सूची बनती तो है, मगर फिर धूल फांकने के लिए छोड़ दी जाती है। पिछले साल जीडीए ने सर्वे कर एक सूची तैयार की, जिसमें करीब 70 अवैध कॉलोनियां थीं, जिनकी संख्या साल भीतर ही बढ़कर 153 पहुंच गई। इन कॉलोनियों को चिह्नित करने के बाद भी प्रभावी कार्रवाई नहीं होने से वहां निर्माण कार्य बदस्तूर जारी हैं।
बदली जाएगी कार्यप्रणाली, अभियंताओं की जिम्मेदारी तय होगी: कमिश्नर
गोरखपुर कमिश्नर व गोरखपुर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष जयंत नार्लिकर ने कहा कि मुख्यमंत्री के निर्देश पर समीक्षा के लिए उन्होंने 21 दिसंबर को प्राधिकरण के अफसरों, अभियंताओं की बैठक बुलाई है। उन्होंने बताया कि कुछ अन्य प्राधिकरणों के साथ गोरखपुर में भी अवैध निर्माण को लेकर प्राधिकरण की कार्यप्रणाली, परियोजनाओं में देरी और पार्कों के विकास आदि का काम काफी धीमा है। इन सभी को सही किया जाएगा।
अवैध निर्माण पर अब सबसे पहले अभियंताओं की जिम्मेदारी तय की जाएगी। यह सच है कि यदि कहीं पर अवैध निर्माण खड़ा हो गया, तो निर्माण के समय संबंधित अभियंता क्या कर रहे थे। करोड़ों की लागत से निर्माण पूरा हो जाने पर क्यों नोटिस, सीलबंदी या ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की नौबत आती है।
इससे प्राधिकरण की छवि तो खराब हो ही रही, कोर्ट आदि में मामले जाने से श्रम, समय और धन भी खर्च होता है। मगर अब सख्ती की जाएगी। उन्होंने कहा कि कुछ लोग तो जनबूझकर अवैध निर्माण कराते हैं मगर बहुत से ऐसे भी लोग होते हैं जिन्हें कानून व नियमों की जानकारी नहीं होती, उन्हें यह जानकारी देने का काम भी प्राधिकरण का ही है।