इसी गांव के रहने वाले नरेंद्र मौर्या और उनके बड़े भाई धर्मेंद्र कुमार की पांच बीघा जमीन सड़क बनाने के लिए सरकार ने ली। इसके बदले में उनको करीब 40 लाख रुपये का मुआवजा दिया गया। इस पैसे से दोनों भाइयों ने हाइवे के किनारे ही नया मकान और कटरा बनवाया। इसी कटरे में नरेंद्र ने किराना की दुकान खोली, जबकि उनके भाई ने शृंगार और सजावट का सामान बेचना शुरू कर दिया।
एक दर्जन से अधिक दुकानों को दोनों भाइयों ने किराए पर दे दिया है। इससे होने वाली आय से परिवार का खर्च चलाने के साथ ही बच्चों की पढ़ाई- लिखाई भी हो रही है। नरेंद्र का कहना है कि उस समय जो रकम तय थी। वहीं सभी लोगों को दी गई, जिसका उन्होंने सदुपयोग किया। उनकी जीवन शैली जरूर बदली। इसी पैसे से शादी- विवाह सहित अन्य काम भी निपट गए।
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मकान बनवाया, जमीन में कर दिए निवेश
जगदीशपुर के रहने वाले आदित्य प्रकाश त्रिपाठी की जमीन कोनी मोड़ पर थी। उनकी पूरी जमीन फोरलेन निर्माण की भेंट चढ़ गई। करीब दो एकड़ भूमि के अधिग्रहण के बाद मुआवजा के रूप में 29 लाख रुपये मिले। इस रकम को पाकर वह संतुष्ट नहीं हुए। लेकिन जो रकम मिली, उससे मोहद्दीपुर में एक नया मकान बनवाया। खेती के लिए अलग जमीन खरीदी।
आदित्य प्रकाश का कहना है कि तब सरकार ने बेहद ही कम पैसा दिया था। करीब-करीब 10 से 12 हजार रुपये प्रति डिसमिल भुगतान किया गया था। इसी क्षेत्र के रवि प्रकाश ने मुआवजे की रकम से ट्रैक्टर खरीद कर खेती में उसका इस्तेमाल किया। 10 साल तक ट्रैक्टर चलाने के बाद उसे बेच दिया।
तमाम ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने अपने हिस्से की रकम को खाने-पीने में उड़ा दी। बसडीला गांव के एक व्यक्ति को ढाई लाख रुपये मिले थे। उन्होंने कोई नया काम शुरू करने के बजाय शराब पीने और शान शौकत में अपनी रकम खर्च कर दी। चौराहे पर पहुंचकर लोगों को दावत देने, लोगों को आकर्षित करने के लिए रोजाना हर हफ्ते नए कपड़े सहित अन्य कामों में अपने पैसा गवां दिए। अन्य लोगों की तरक्की देखकर वह पछतावा रहता है।
लखनऊ से गोरखपुर होते हुए कुशीनगर तक फोरलेन का शुभारंभ वर्ष 2012 में हुआ था। इस हाइवे के निर्माण में 24 गांवों के 400 किसानों की जमीनें अधिगृहित की गईं। बसडीला गांव के सामने से होकर फोरलेन गुजरती है। इस गांव के अक्षयवर यादव, भगवंत और अभिमन्यु यादव तीन भाई हैं।
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अक्षयवर दुबई में रहकर शटरिंग का काम करते थे। भगवंत फैजाबाद की चीनी मिल में कार्यरत थे। तीनों भाइयों की 36 डिसमिल जमीन सड़क के लिए अधिगृहित की गईं। नौ लाख रुपये मुआवजा मिला तो अभिमन्यु यादव ने गांव के सामने ही ढाबा खोलकर रोजगार शुरू कर दिया। इसी ढाबे की देखभाल के लिए उन्होंने अपने भाई अक्षयवर को दुबई से बुला लिया।
चीनी मिल की नौकरी छोड़कर भगवंत भी गांव आ गए। अब तीनों भाई मिलकर ढाबा चलाते हैं। आठ- आठ घंटे का समय देकर ढाबे से परिवार की आजीविका चला रहे हैं। अभिमन्यु का कहना है कि तब उन लोगों का काफी पैसा मिला था। इसलिए ज्यादा बड़ा कारोबार नहीं शुरू कर पाए, लेकिन मुआवजे से आगे बढ़ने में मदद मिल रही है।
सिक्टौर, तालकंद्रा, कोनी, रामपुर बजुर्ग, जगदीशपुर, बसडीला, भैंसहा, रामनगर कड़जहां, बहरामपुर, कुरमौल, कटहरवां, खलवा टोला, सिसवा उर्फ चनका, मल्लपुर, जगपुर, रामूडीहा आदि।
पैसे से खोला ढाबा
बसडीला निवासी अभिमन्यु यादव ने कहा कि मेरे दोनों भाई बाहर रहकर कमाते थे। पैसा मिला तो हम लोगों ने ढाबा खोलने का फैसला लिया। हाइवे से गुजरने वाले ट्रक सहित अन्य वाहन रुकते हैं। इससे अच्छी कमाई हो जाती है। अब एक नया ढाबा खोलने की सोच रहे हैं।
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दुकान में लगाई रकम
बसडीला निवासी नरेंद्र मौर्या ने कहा कि हम लोगों के पास खेती की जमीन थी। पूरा परिवार खेती पर निर्भर था। सरकार ने जब जमीन ली तो मां खूब रोई। उसे लगा कि मेरे बच्चे अब कैसे जीएंगे, लेकिन हम लोगों को जो पैसा मिला। उसी से नया मकान और कटरा बनवाकर अपनी दुकान खोल ली। अब कोई दिक्कत नहीं है।
मुआवजे की रकम से बच्चे पढ़ाएंगे
माड़ापार निवासी जयराम यादव ने कहा कि मैं दूध बेचता था। तब हर गांव में लोगों के भैंस और गायें थीं। इसलिए कम बिक्री होती थी। मेरे दो बच्चे हैं। उनकी पढ़ाई और बेटी की शादी की चिंता थी। मुआवजा मिला तो मैंने अपने हिस्से का पैसा बैंक में जमा करा दिया। तभी तय कर लिया था कि इसी पैसे से बच्चों की पढ़ाई पूरी करुंगा।
माड़ापार निवासी राधेश्याम ने कहा कि मेरी पत्नी काफी बीमार थी। मैंने उनकी जांच कराई तो पता लगा कि कैंसर हो गया है। उपचार करा पाना मेरे लिए मुश्किल था। मुझे और मेरे भाइयों को मुआवजा मिला। मेरे हिस्से में जो पैसा आया। उसी से मैंने पत्नी का उपचार कराया। कोरोना की पहली लहर तक वह मेरे साथ रहीं।
जमीन खरीदी और मकान
जगदीशपुर निवासी आदित्य प्रकाश त्रिपाठी ने कहा कि मेरी काफी भूमि सड़क निर्माण की भेंट चढ़ गई। इसका हम लोगों को कोई फायदा नहीं हुआ। फिर भी जो पैसा मिला। उससे नए सिरे से जमीन खरीदी। शहर में छोटा मकान लिया। इसके अलावा कोई विकल्प नहीं था।