दिवाली में पटाखों का शोर कानों को भी 'चोट' पहुंचाता है। आंकड़े बताते हैं कि दिवाली के दौरान ध्वनि प्रदूषण का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के निर्धारित मानक से काफी ज्यादा रहता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि लंबे समय तक मानक से ज्यादा ध्वनि के बीच रहने से सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमएमएमयूटी) के विज्ञानी व विद्यार्थियों की मदद से गोरखपुर के आवासीय, औद्योगिक व व्यावसायिक क्षेत्रों में ध्वनि प्रदूषण का डाटा जुटाया था। इसके मुताबिक दिवाली के दौरान शहर में वायु और ध्वनि प्रदूषण का स्तर खतरनाक रहता है।
विज्ञानी प्रो. गोविंद पांडे बताते हैं कि 2019 के आंकड़ों पर नजर डालें तो दिवाली की रात आठ बजे तक ध्वनि का स्तर 85.6 डेसिबल था। रात नौ बजे तक यह 91.8 डेसिबल तक पहुंच गया। देर रात ध्वनि का स्तर 88.2 डेसिबल रिकार्ड किया गया। जबकि गोरखपुर में दिन के ध्वनि प्रदूषण का सामान्य मानक 55 और रात का 45 डेसिबल रहता है।
पिछले वर्षों में गोरखपुर में दिवाली की रात ऐसा रहा ध्वनि प्रदूषण का स्तर (रिहायशी क्षेत्र)
वर्ष अधिकतम ध्वनि स्तर (डेसिबल में )
2019 85.6
2018 91.8
2017 89.6
2016 93.7
2015 88.7
ध्वनि प्रदूषण के मानक (रेगुलेशन एंड कंट्रोल रूल 2000 के अनुसार )
क्षेत्र अधिकतम न्यूनतम (डेसिबल)
औद्योगिक 75 70
व्यावसायिक 65 55
आवासीय 55 45
शांत क्षेत्र 50 40
विदेशों के मानक (आवासीय क्षेत्र)
जापान 50 40
स्वीडन 55 45
जर्मनी 55 40
आस्ट्रिया 48 51
डब्ल्यूएचओ के मानक के अनुसार
55 45
125 डेसिबल से ज्यादा आवाज वाले पटाखों की बिक्री पर है प्रतिबंध
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने 125 डेसिबल से अधिक आवाज वाले पटाखों पर निर्माण व फोड़ने पर प्रतिबंध लगाया है, फिर दिवाली के समय इस क्षमता के पटाखे धड़ल्ले से बिकते हैं। इस बार जिला प्रशासन ने सख्ती की बात कही है। 12, 13 और 14 नवंबर को दुकान लगाने वालों से कम ध्वनि के पटाखों को बेचने को कहा गया है।
एमएमएमयूटी प्रो. गोविंद पांडेय ने बताया कि तेज आवाज वाले पटाखों में बारूद, चारकोल, नाइट्रोजन और सल्फर जैसे घातक रसायनों का इस्तेमाल ज्यादा मात्रा में होता है। पटाखों से चिंगारी, धुआं और तेज आवाज निकलती है। रसायनों का मिश्रण गैस के रूप में वातावरण में घुल जाता है, जो बेहद नुकसानदायक होता है।
गोरखपुर एनवायरमेंटल एक्शन ग्रुप के मौसम विशेषज्ञ कैलाश पांडेय ने बताया कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार अगर ध्वनि प्रदूषण 85 डेसिबल से ज्यादा है तो 23 प्रतिशत लोगों को सिरदर्द की शिकायत होने लगती है। 13 प्रतिशत लोगों उच्च रक्तचाप की चपेट में आ जाते हैं। सात प्रतिशत लोगों में चिड़चिड़ेपन की शिकायत मिलती है। ऐसे में दिवाली में पटाखा फोड़ने से परहेज करना चाहिए।
वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. अखिलेश कुमार सिंह ने बताया कि अगर पटाखे की आवाज 85 डेसिबल से ज्यादा है तो ब्लड प्रेशर, हार्ट के मरीजों को दिक्कत होती है। 130 डेसिबल से ज्यादा आवाज वाले पटाखों से सुनने की क्षमता खत्म हो सकती है। दिवाली में पटाखों से दूरी बनाने की जरूरत है। इससे जनता के साथ पर्यावरण का भी भला होगा।