मजदूरों के खून को बेचकर रुपये कमाने का अवैध धंधा बीते 15 वर्ष पहले भी होता था। लेकिन, तब सिर्फ एक खूनचुसवा गिरोह ही सक्रिय था लेकिन अब खून माफिया सक्रिय हैं। इस धंधे में एजेंट से लेकर मेडिकल कॉलेज के कर्मचारी भी शामिल हैं।
मजदूरों का खून निकलवाने का धंधा वर्ष 2008 में भी पकड़ा गया था। तब 17 मजदूरों को बंधक बनाकर हफ्ते में तीन बार उनका खून निकाल जाता था और सेटिंग से बेचा जाता था। समय मास्टरमाइंड बताया गया पश्चिम बंगाल का जयंत सरकार पर आज भी 25000 रुपये का इनाम है, जिसे पुलिस नहीं पकड़ सकी है।
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अब इस खेल में माफिया सक्रिय हैं। पुलिस की जांच में पता चला है कि नेटवर्क में मेडिकल कॉलेज के संविदा कर्मचारियों से लेकर ब्लड बैंक तक के कर्मचारी शामिल है। वहीं, मजदूर को रक्तदाता बताकर खून बेचा जा रहा है।
दोनों ही मामलों में एक बात समान है कि मजदूरों का ही टारगेट बनाया है। मजदूरों को गिरोह का सदस्य बनाकर आसानी से रक्तदाता बता दिया जाता है। इसके बाद जिसे खून दिया जाता है उससे मोटी रकम ऐंठ ली जाती है। हिस्सा सभी में बंट जाता है।