सदर तहसील के राजस्व ग्राम कोनी के करीब 200 परिवारों के लोग एक साथ दस्तावेजों की मोटी फाइलें लेकर अपना पक्ष रखने के लिए दौड़ लगा रहे हैं। उनका कहना 60-70 साल से अधिक समय से वह जिस जमीन पर काबिज हैं उसे अब सीलिंग की बताया जा रहा है। गांव के लोग कलेक्ट्रेट से लेकर सदर तहसील के चक्कर लगा रहे हैं।
कोनी के पूर्व प्रधान प्रेमचंद चौरसिया कहते हैं कि करीब 184 एकड़ जमीन का मामला है। प्रशासन, मजीठिया ही नहीं कई लोगों की पुश्तैनी जमीन को भी सीलिंग की बता रहा है। वह गांव में हुई पहली चकबंदी का जोत आकार पत्र 45 दिखाते हैं। इसमें मुकदमा नंबर 64 तारीख फैसला 28 मार्च 1964 में आदेश है कि गुर निहाल सिंह व दिलीप सिंह का नाम खारिज कर बलवंत सिंह का नाम दर्ज हो।
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इसी तरह मुकदमा नंबर 62 में 28 मार्च 64 को ही गुर निहाल व दिलीप का नाम खारिज कर सत्यपाल व मदन का नाम दर्ज करने का आदेश है। मुकदमा नंबर 62 में मंगल सिंह, मुकदमा नंबर 65 मुनीलाल, 54 में केसर सिंह, 66 में हरदत्त सिंह, 60 में दरबारी सिंह, 63 में डेली दास, 61 में हरबंस लाल का नाम दर्ज करने का आदेश है। 1968 में इस गांव का बंदोबस्त भी बन गया था। तब से 20 साल यह गांव पुन: तहसील में रहा।
1989-90 में दूसरी बार चकबंदी प्रक्रिया शुरू हुई। सरकार की तरफ से तब भी कोई आपत्ति नहीं आई। 2008 में दोबारा चकबंदी का बंदोबस्ती भी तहसील में चला गया। सब कुछ ठीक चल रहा था। पूर्व प्रधान का कहना है कि अचानक 2019 में कुछ जमीन को सीलिंग बताया गया। अब फिर प्रशासन ने सीलिंग की जमीनों की जो सूची प्रकाशित कराई है, उसमें इन जमीनों के गाटा संख्या को भी दर्ज कर दिया गया है। सारे साक्ष्य दिखाए जाने के बाद भी कोई सुनवाई नहीं हो रही है।
कोनी निवासी दिग्विजय सिंह ने कहा कि रिट संख्या 11934/ 2020 रामसेवक व अन्य में, न्यायमूर्ति पीयूष अग्रवाल ने गोरखपुर के सीलिंग अधिकारी को तीन माह के अंदर प्रकरण को देखकर निस्तारण के आदेश दिए हैं। इसी तरह दिग्विजय सिंह, अमरनाथ, पूर्व प्रधान रामरेखा सहित कुल 22 लोग हाईकोर्ट में रिट दायर कर चुके हैं। हाईकोर्ट के आदेश के बाद 17 लोगों के मामलों की सुनवाई सीआरओ के यहां और पांच लोगों के मामलों की सुनवाई कमिश्नर के यहां चल रही है। यहां से फैसला हो जाता तो हम फिर हाई कोर्ट जाते। मगर यहां भी मामला लटकाया जा रहा है।
कोनी के पूर्व प्रधान प्रेम चंद चौरसिया ने कहा कि सीलिंग लागू होने से पहले ही जमीन ग्रामीणों या उनके बाप-दादा के नाम से खाते में आ चुकी थी, तभी से वह काबिज हैं। मेरे अलावा गांव के लाल बचन, रामवृक्ष, रामसमुझ, रामजीत, सीताराम, त्रिभुवन, रामरेखा, दिग्विजय सिंह, देवेंद्र सिंह, स्वामीनाथ, चंद्रभान, राजेंद्र, नारद, अवध राज, श्रवण, दुलारे समेत कई अन्य की जमीन फोरलेन में आई थी। हमें मुआवजा भी मिल चुका है। कई किसानों को इसी नंबर पर केसीसी से बैंक ऋण भी मिल चुका है, बावजूद इसके हमारी जमीन को भी प्रशासन सीलिंग की जमीन बता रहा है।
कोनी राम प्रताप ने कहा कि 29 जुलाई 1963 को मेरे पिता काशी के नाम, उनके नाना सुंदर ने अपनी जायदाद रजिस्ट्री कर दी थी। असिस्टेंट कलेक्टर द्वारा 4 दिसंबर 1961 को सुंदर के नाम उक्त जमीन का मालगुजारी जमा करने का भी कागजात है। इसके बावजूद उनकी जमीन को भी सीलिंग दिखाया गया है। इसी तरह गांव के कई लोगों की पुश्तैनी जमीन को भी सीलिंग की जमीन बताया जा रहा है।
डीएम कृष्णा करुणेश ने कहा कि सीलिंग की जमीन के गाटे सार्वजनिक किए जाने के बाद आपत्तियों पर सुनवाई हो रही हैं। सभी की बात सुनी जा रही है। लोगों की तरफ से प्रस्तुत दस्तावेजों का भी परीक्षण कराया जा रहा है। किसी के साथ भी अन्याय नहीं होगा। अभी बड़े गाटों की पैमाइश कराई जा रही है। आबादी वाले क्षेत्र में अभी कार्रवाई नहीं हो रही है। अब तक की कवायद में करीब 350 एकड़ जमीन प्रशासन को मिलने की उम्मीद है। अब महादेव झारखंडी टुकड़ा नंबर तीन में एक्सरसाइज कराई जा रही है।