बैजनाथ अग्रवाल करीब 40 वर्षों तक गीता प्रेस के ट्रस्टी रहे। अपने कार्यकाल में वह नियमित गीता प्रेस आते थे। निधन के एक सप्ताह पहले तक वह अपने पुत्र व गीता प्रेस के ट्रस्टी देवीदयाल अग्रवाल के साथ गीता प्रेस आते रहे। वह गीता प्रेस के सभी कर्मचारियों को अपने पुत्र के समान मानते थे, चाहे छोटा हो या बड़ा सबकी बात सुनते थे। गीता प्रेस के कर्मचारी भी उन्हें अपना अभिभावक मानते थे। किसी भी बड़ी समस्या का समाधान वह आसानी से कर देते थे।
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दो राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में हुए शामिल
1950 में बैजनाथ अग्रवाल गीता प्रेस से जुड़े। 29 अप्रैल 1955 को देश के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद गीता प्रेस आए थे। इस दौरान उन्होंने गीता प्रेस में स्थित लीला चित्रमंदिर और गीता प्रेस के मुख्यद्वार का लोकार्पण किया था। 68 वर्ष पूर्व हुए इस कार्यक्रम में बतौर कर्मचारी बैजनाथ अग्रवाल मौजूद थे।
वर्ष 2022 में गीता प्रेस के शताब्दी वर्ष समारोह के उद्घाटन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आए तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के साथ भी वह मंच बतौर ट्रस्टी मौजूद रहे। इस वर्ष अगस्त में शताब्दी वर्ष समारोह के समापन कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मंच पर वह मौजूद थे।
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गीता प्रेस ट्रस्ट के अध्यक्ष रहे केशोराम अग्रवाल के बाद बैजनाथ अग्रवाल दूसरे सबसे वरिष्ठ ट्रस्टी थे। इतने वरिष्ठ होने के बाद भी उन्होंने कभी भी कोई पद नहीं लिया, सिर्फ सदस्य ट्रस्टी के रूप में सेवा कार्य करते रहे। उनका मानना था कि उन्हें सिर्फ गीता प्रेस की सेवा करनी है, इसके लिए कोई पद जरूरी नहीं है।
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खुला रहा गीता प्रेस
शनिवार को गीता प्रेस खुला रहा। बैजनाथ अग्रवाल को श्रद्धा सुमन अर्पित करने के बाद कर्मचारी हर दिन की तरह उत्पाद प्रबंधक आशुतोष उपाध्याय की देख-रेख में काम में लगे रहे।
गीता प्रेस को आगे बढ़ाने में पिताजी का महत्वपूर्ण योगदान था। उनके सानिध्य में ही हम सभी यहां काम करते थे। उनके जाने से जो क्षति हुई है उसे भर पाना मुश्किल है।
- देवीदयाल अग्रवाल, ट्रस्टी व पुत्र
बैजनाथ अग्रवाल को हम सभी अपने अभिभावक की तरह मानते हैं। उनके निर्देशों का पूरी तरह से पालन करते थे। उनके मार्ग दर्शन में गीता प्रेस को दुनियाभर में पहचान मिली है।
-डॉ. लालमणि तिवारी, प्रबंधक
वह बहुत ही मृदुभाषी थे। कितनी भी बड़ी समस्या हो उसका समाधान वह आसानी से कर देते थे। उनका जाना हम सभी के लिए अभिभावक के जाने के समान ही है।
-आशुतोष उपाध्याय, उत्पाद प्रबंधक
ऋषिकेश में रहकर सत्संग करता था। 28 वर्ष पूर्व उनके ही कहने गोरखपुर आया और यहां सेवा कार्य से जुड़ गया। वह हमें पिता की तरह दुलार करते थे।
-रूपेश चौबे, कर्मचारी