अभिनेता मकरंद देशपांडे ने कहा कि थिएटर हो या सिनेमा, एक कलाकार में सबसे ज्यादा जरूरी काम के प्रति ईमानदारी होती है। उन्हें लगता है कि उन्होंने इंडस्ट्री को समय कम दिया है। शायद यही वजह है कि उनके किरदार सदैव साइड या नकारात्मक ही रहे।
मकरंद देशपांडे रविवार को गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट में शामिल होने मुंबई से आए थे। वह हिंदी और मराठी में नाटकों और फिल्मों के लिए लेखन, निर्देशन से जुड़े हुए हैं। अपने विलक्षण व्यक्तित्व के लिए मशहूर मकरंद ने जंगल, सरफरोश, स्वदेश, मकड़ी और डरना जरूरी है, जैसी हिंदी फिल्मों में प्रभावशाली अभिनय किया।
पांच से अधिक भाषाओं की फिल्मों में विशेष किरदार निभाने वाले मकरंद देशपांडे ने अमर उजाला से बातचीत करते हुए कहा कि उन्हें लगा कि बाबा (गुरु गोरखनाथ) का बुलावा है तो वह यहां के लिए निकल पड़े। एयरपोर्ट पर फ्लाइट से उतर कर बाहर निकल रहा था तो वहां खड़े हुए हथियार लिए जवानों ने उन्हें दूर अंधेरे में देखकर पीछा करते हुए हेलो कहा। यह अपने आप में सुखद है।
अभिनेता मकरंद देशपांडे
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
उन्होंने कहा कि यहां के लोग अति विनम्र व सहृदयी हैं। अतः यहां दिखावे का कोई स्थान शेष नहीं रह गया है, जो स्वयं में अद्भुत है। यहां आकर सबसे पहले गोरखनाथ मंदिर और गीताप्रेस गया। गीताप्रेस से कुछ पुस्तकें भी खरीदीं। अद्भुत इतिहास है इस मिट्टी का।
अब स्टार नहीं फिल्म को देख रहे दर्शक
मकरंद देशपांडे ने कहा कि उन्हें लगता है कि अब ऑडियंस स्टार नहीं, फिल्म को देख रही है। हाल ही में पुष्पा-2 रिलीज हुई। उन्हें नहीं लगता है कि लोग पुष्पा मूवी देखने गए थे। वह पुष्पा के किरदार को देखने गए थे। अब ये देखना होगा कि अल्लू अर्जुन की जब अगली फिल्म आएगी, जिसमें वह पुष्पा नहीं होंगे तो वह लोगों को कितनी प्रभावित कर पाएगी। उन्होंने कहा कि फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें कभी किसी गॉडफादर की जरूरत नहीं पड़ी।
जीवन में एकलव्य का किरदार निभाना चाहूंगा
उन्होंने फिलहाल के अपने लुक के बारे में कहा कि वह अल्बर्ट आइंस्टीन पर आधारित एक मंचन कर रहे हैं। उसी के अनुसार ऐसा है। वह जीवन में एकलव्य का किरदार अवश्य करना चाहते हैं। कहा कि वेब सीरीज को स्टार की जरूरत नहीं होती। सिनेमा शायद बिना स्टार के उतना बड़ा हो भी न पाए। कहानी उतनी बन नहीं पा रही है। उन्होंने कहा कि अच्छा काम करते रहें। काम ही काम लेकर आता है।