महाभारत धारावाहिक बनने का किस्सा कम रोचक नहीं है। ये उस धारावाहिक से भी ज्यादा मनोरंजक है।
बलदेव राज चोपड़ा यानी बी. आर. चोपड़ा आधुनिक युग के नामचीन फिल्म निर्माता रहे। वी. शांताराम के अतिरिक्त वह शायद अकेले ऐसे फिल्मकार थे, जिन्हें किसी विश्वविद्यालय ने डी.लिट की मानद उपाधि से नवाजा और अपनी इस उपलब्धि पर उन्हें गर्व भी था।
मुंबई के उसी उपनगर सांताक्रुज में उनका आवास था, जहां मैं रहता था और मेरे ही अपार्टमेंट में चूंकि उनके सिनेमाटोग्राफर महेंद्र नाथ मल्होत्रा रहते थे। उनसे मिलने चोपड़ा वहां आते रहते थे, इससे मेरे साथ भी उनका अच्छा-खासा घरोपा स्थापित हो गया था।
बात तब की है, जब उन्होंने अपने टीवी सीरियल महाभारत का निर्माण शुरू किया था। महाभारत की कथा-पटकथा राही मासूम रजा ने तैयार की थी, जो मेरे अग्रज तुल्य मित्र थे। जब कभी चोपड़ा से मिलने वह उनके आवास या कार्यालय जाते, तो रास्ते में होने के कारण अक्सर मेरे फ्लैट की घंटी भी बज जाती और फिर अगर मेरे पास कोई दूसरा काम नहीं होता, तो मैं उनके साथ हो लेता।
ऐसे ही किसी मौके पर मैंने चोपड़ा साहब से कहा था, `यह क्या गजब कर रहे हैं भाईजान। बचपन में मैंने यह कहते लोगों को सुना था कि किसी घर में महाभारत की पोथी नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि वैसा करने से असमय ही लोगों के बीच लड़ाई-झगड़ा शुरू हो सकता है। आप हैं कि उसे घर की चारदीवारी से निकाल कर पूरे देश में फैलाने की कोशिशों में रत हैं।
ऐसा करने से क्या हमारा मुल्क आपस की मारकाट में नहीं लग जाएगा?’ `तुम्हारे मुंह में घी-शक्कर।' चोपड़ा ने तपाक से जवाब दिया था। `महाभारत शांति स्थापना का महाग्रंथ है और उस शांति को हम क्रांति के माध्यम से ही अर्जित कर सकते हैं। निश्चित ही उस युद्व में विनाश की संभावनाएं निहित हैं, लेकिन विनाश ऐसे ही लोगों का होगा, जो शांति की स्थापना में बाधक होंगे।
राही मासूम रजा ने अपनी बात जोड़ी थी, `इस महाभारत में कृष्ण की भूमिका यहां का जनसमूह अभिनीत करेगा। झूठे वायदों, झूठी प्रगति, झूठे विकास और झूठी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटकर जो व्यक्ति, दल या समाज जनता को बरगलाने की कोशिश करेगा, वह स्वतः इस तरह नेस्तनाबूत हो जाएगा, जैसे गधे के सिर से उसके सींग।