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Sardar Udham Movie Review: शूजीत की सुस्त फिल्मों का कालचक्र पूरा, लोकप्रिय तराने पर लिखा महाकाव्य

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सरदार उधम - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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Movie Review
सरदार उधम
कलाकार
विक्की कौशल , शॉन स्कॉट , स्टीफन होगन और अमोल पाराशर
लेखक
शुभेंदु भट्टाचार्य और रितेश शाह
निर्देशक
शूजित सरकार
निर्माता
रॉनी लाहिड़ी और शील कुमार
ओटीटी
अमेजन प्राइम वीडियो
रेटिंग
2.5/5

बड़े परदे के लिए बननी शुरू हुई फिल्मों के सीधे ओटीटी पर रिलीज होने की मजबूरी का एक कालचक्र फिल्म ‘सरदार उधम’ के प्राइम वीडियो पर रिलीज होने से पूरा हो रहा है। शूजीत निर्देशित फिल्म ‘गुलाबो सिताबो’ से ही ये सिलसिला शुरू हुआ और उम्मीद की जानी चाहिए कि उनकी ही फिल्म ‘सरदार उधम’ से ये चक्र पूरा हो जाए। एक चक्र शूजीत उस सिनेयात्रा का भी पूरा कर रहे हैं जो उन्होंने बतौर निर्देशक ‘पीकू’ की शानदार कामयाबी के बाद फिल्म ‘अक्टूबर’ से शुरू किया। ‘गुलाबो सिताबो’ के बाद ‘सरदार उधम’ को इस फिल्मत्रयी की आखिरी फिल्म माना जा सकता है। इन तीनों फिल्मों की बुनावट बिल्कुल एक जैसी है। बुनाई के फंदे भी तकरीबन एक जैसे ही हैं। अपने मूल बिंदु पर आने से पहले शूजीत अब अपने प्रशंसकों और आम दर्शकों के धैर्य का खूब इम्तिहान लेते हैं। हां, अगर आपने 40-45 मिनट के भीतर फिल्म देखनी बंद नहीं कर दी तो फिर इस धैर्य का प्रसाद भी वह देते हैं। सवाल यही है कि ‘नो टाइम टू डाय’, ‘शांगची-द लेजेंड ऑफ द टेन रिंग्स’ और ‘वेनम: लेट देयर बी कारनेज’ के दौर में शूजीत का सिनेमा नई पीढ़ी के दर्शकों के लिए कितना सामयिक बचा है?

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सरदार उधम - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
स्टीवन स्पीलबर्ग ने एक फिल्म अरसा पहले बनाई थी ‘सेविंग प्राइवेट रयान’। युद्ध का विध्वंस, इसकी भयावह तस्वीरें और इन तस्वीरों के जरिये दर्शकों को सिहरा देने वाली स्पीलबर्ग की मेकिंग लोग ‘डनकिर्क’ देखने के बाद भी नहीं भूले। जलियांवाला बाग की दिल दहला देने वाली तस्वीरें फिर से बनाने और वहां तक दर्शकों को लाने के लिए शूजीत सरकार एक लंबा, घुमावदार और कहीं कहीं तो फ्लैशबैक के भीतर फ्लैशबक का रास्ता चुनते हैं। वह कमाल के निर्देशक हैं। अपनी कहानियां जिस तरह उन्होंने ‘विकी डोनर’, ‘मद्रास कैफे’ और ‘पीकू’ में रचीं, ‘अक्टूबर’, ‘गुलाबो सिताबो’ और अब ‘सरदार उधम’ उसके ठीक विपरीत बनी फिल्में हैं। वह अब अपने तरह का सिनेमा बना रहे हैं। अपने संतोष और अपनी संतुष्टि के लिए। किसी फिल्ममेकर के लिए यही सही रास्ता होना भी चाहिए लेकिन उनकी आखिर की तीनों कहानियां उनके सिनेमा से मेल नहीं खातीं। वह कमर्शियल सिनेमा की कहानियां आर्ट सिनेमा की तरह बनाना चाह रहे हैं। और, यहीं शायद वह चूक रहे हैं। उनको अगर अल्प अवधि में सिमट सकने वाली कहानियों पर लंबी फिल्में बनानी ही हैं तो इसके लिए फिल्म का ग्राफ उनको सही रखना चाहिए। ‘सरदार उधम’ 90 मिनट की एक बढ़िया और रोमांचक फिल्म बन सकती थी।

सरदार उधम - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कथित रूप से बड़े परदे के लिए ही बननी शुरू हुईं और ओटीटी पर आ गिरने वाली हाल की तमाम फिल्मों से एक बात तो ये साफ होती है कि मुंबई में फिल्म बस एक निर्देशक को एक हीरो या हीरोइन भी मिल जाने भर से ही शुरू हो जाती है। कहानी, पटकथा, संवाद, संगीत बाकी सब इसके बाद बनता बिगड़ता रहता है। फिल्म ‘सरदार उधम’ के साथ भी ऐसा ही होता दिखता है। पंजाब के शेर या कहें कि शेर सिंह की कहानी का लंदन में घटता हिस्सा इतना रंगविहीन, स्वादविहीन और गंधविहीन है कि कभी कभी तो यूं लगने लगता है कि बटलोई में पकती ये दाल चूल्हे में आग जलती रहने तक पकेगी भी कि नहीं। रिश्ते, नाते, प्यार, वफा सब ताक पर रख दिए हैं इस शेर ने। साथ में संवाद आता भी है कि तुम सबको तो फंदा ही अच्छा लगता है ना। फिर बांह पसारकर उस पर लिखे कौमी एकता के नारे जैसा अपना नाम दिखाने तक फिल्म लंबे लंबे गोते लगाती है। अंग्रेजी समझ सकने वाले एक बंदे को भी अनुवादक दिलाने वाली इसकी पटकथा में और भी तमाम झोल हैं लेकिन बहरहाल फिल्म जलियांवाला बाग कांड तक पहुंच ही जाती है।

सरदार उधम - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, इस एक सीन के बाद शूजीत सरकार दर्शकों को समझाने की कोशिश करते हैं कि अभी तक चुभाए गए नश्तर दर्द के इस गुबार को दिल तक पहुंचाने के लिए ही थे। गोलियों की बौछार के बीच चीखते बिलखते लोग। जान बचाने की जद्दोजहद में दिखती जिंदगी। और फिर घायलों को ढोने वाला इकलौता एक शख्स! पता नहीं ये गलती निर्देशन की चूक है या फिर जानबूझकर टेंट पोल तानने की कोशिश, लेकिन इसी सीन को ओटीटी पर रिवाइंड करके देखने पर एहसास बदलने लगते हैं। इस एक सीन से फिल्म के अब तक के देखे गए सीन और आगे के सीन भी ये साफ कर देते हैं कि ये सरदार उधम सिंह की बायोपिक नहीं है। ये एक किस्से को कहानी में बदलने की कोशिश है जिसमें इसके लेखकों और निर्देशक ने ‘सिनेमाई छूट’ जमकर ली है। ये देश आजादी के नायकों को पूजने वालों का देश है। देशभक्ति की नई फिल्मी बयार के बीच फिल्मेकर ऐसे किरदार तलाश रहे हैं जिनका एक किस्सा भी उन्हें एक फिल्म बनाने का ‘मसाला’ दे दे। लेकिन, सिनेमा नायकों के कौशल और करतबों की कहानी पर मोहित होता है। उनके यात्रा वृतांत पर नहीं। 
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विक्की कौशल - फोटो : Insatagram- @vickykaushal09
बतौर निर्देशक शूजीत सरकार ने ‘सरदार उधम’ पर फिल्म बनाने का साहसिक काम किया है। इस शख्सीयत पर फिल्म बनाने की पहली कोशिश निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी ने कोई 50 साल पहले परीक्षित साहनी को लेकर की थी। तब गुलजार ने भी फिल्म के एक सीन में एक्टिंग की थी। वह काम यहां रितेश शाह करते दिखते हैं। लेकिन, अगर ऋषिकेश मुखर्जी को अपनी फिल्म पूरी करने का मौका मिला होता तो शायद दर्शकों को आजादी के एक तराने पर महाकाव्य पढ़ने की जहमत न उठानी पड़ती है। हिंदी सिनेमा इन दिनों दिमाग में कौंधे किसी एक विचार पर फिल्म बनाने चल दे रहा है। हालांकि ‘सरदार उधम’ में रिसर्च, आर्ट डायरेक्शन, सिनेमैटोग्राफी सब उम्दा है लेकिन तकनीकी रूप से बनी इस बेमिसाल फिल्म की पटकथा और इसकी बुनावट में असल समस्या है। विकी कौशल ने अपनी तरफ से सरदार उधम बनने की मेहनत पूरी की है और ये परदे पर दिखती भी है। बस, फिल्म देखते समय दिमाग में बार बार एक ही बात आती रहती है कि इस रोल में अगर वाकई इरफान होते तो फिल्म कैसी होती?
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