फिल्म ‘सनक’ की कहानी यूं है कि हृदय की आनुवंशिक बीमारी से जूझती अपनी पत्नी के इलाज के लिए मिक्स मार्शल आर्ट्स का एक ट्रेनर हर संभव कोशिश कर रहा है। इस बीच जिस अस्पताल में उसकी पत्नी का इलाज चल रहा है वहां ‘आतंकी’ हमला होता है। इन हमलावरों में अलग अलग देशों के भाड़े के लोग शामिल हैं। लीडर इनका अपने अलग स्वैग में है। अपनी बीवी को बचाने के लिए विवान नाम का एमएमए ट्रेनर अस्पताल में दाखिल होता है। कुछ बेमेल दोस्त बनाता है। अपनी उस्तादी के एक्शन दिखाता है और मामला संभालने की कोशिश करता है। इतना सब हो रहा है तो पुलिस भी है। पुलिस में महिलाओं की स्थिति पर वैसे तो राष्ट्रीय पुलिस अकादमी को अलग से शोध करना चाहिए और बरसों से लंबित पड़े पुलिस सुधारों को लागू भी करना चाहिए। लेकिन पुलिस चूंकि फिल्मी है तो कहानी का विलेन भी जानता है कि देर से ही पहुंचेगी। किसी हिंदी फिल्म में हिंदी सिनेमा की ही खिल्ली उड़ाने का फिल्म ‘रश्मि रॉकेट’ के बाद ये लगातार दूसरा मामला है।
विद्युत जामवाल के करियर की ‘यारा’, ‘खुदा हाफिज’ और ‘द पॉवर’ के बाद ‘सनक’ चौथी फिल्म है जो सीधे ओटीटी पर रिलीज हुई है। साल 2011 में विपुल अमृतलाल शाह उन्हें फिल्म ‘फोर्स’ से हिंदी सिनेमा में लेकर आए थे। विद्युत की यूएसपी उनका एक्शन है। वह चाहते तो अच्छी, भावुक और दर्शकों से संवाद कर सकने वाली कहानियां चुनकर देसी ब्रूस ली या जैकी चैन बन सकते हैं लेकिन उनकी कहानियों और कथ्य की समझ अब तक भारतीय दर्शकों से न जुड़ पाने का ही नतीजा है कि उनकी फिल्म बड़े परदे पर रिलीज करने की हिम्मत बदले माहौल में विपुल शाह जैसे निर्माता भी नहीं कर पाए। विद्युत की फुर्ती में एक करंट है। उनके अभिनय में उमंग है और तरंग उनके एक्शन की ऐसी है कि उसमें अब नवीनता ला पाना बहुत मुश्किल काम है।
फिल्म ‘सनक’ जिसको भी देखनी है जाहिर है विद्युत का एक्शन देखने के लिए ही देखनी है। फिल्म के लेखक आशीष और निर्देशक कनिष्क ने भी शायद ये पहले दिन से ही समझ लिया। फिल्म में एक संवाद है, ‘अगर मेरी सनक गई तो..!’ ऐसी हिंदी वाली और सनक शब्द का मतलब तक न समझने वाली इस फिल्म से और कुछ उम्मीद भी नहीं बंधती है। फिल्म में विद्युत के अलावा किसी दूसरे किरदार का पटकथा में आगा पीछा जमाने की दोनों ने कोशिश ही नहीं की। जिस पत्नी को बचाने के लिए विवान जान पर खेलने को तैयार दिखता है, उससे उसका भावनात्मक और मानसिक जुड़ाव तक फिल्म स्थापित करने में चूक जाती है। पटकथा और निर्देशन में चूकी फिल्म ‘सनक’ संगीत के स्तर पर भी मात खाती है। चिरंतन भट्ट और जीत गांगुली इसका एक भी गाना याद रह पाने लायक नहीं बना पाए और सौरभ भालेराव के पार्श्वसंगीत में शोर के सिवा कुछ नहीं है। प्रतीक देवड़ा की सिनेमैटोग्राफी औसत है और फिल्म का संपादन बहुत ही ढीला। फिल्म ‘सनक’ अगर सिर्फ 90 मिनट की फिल्म होती तो शायद ज्यादा असरदार रहती।
विद्युत जामवाल की फिल्म ‘यारा’ को छोड़ दें तो उनकी बतौर लीड हीरो अब तक की सारी फिल्मों का कमजोर पहलू यही रहा है कि फिल्म के दूसरे किरदारों को कहानी में तवज्जो नहीं मिलती। इन फिल्मों में विद्युत अभिनय भी एक सा करते रहे और एक्शन भी। फिल्म ‘सनक’ का बेहतर पहलू ये है कि यहां एंडी लॉन्ग नगुयेन ने उन्हें कुछ नए दांव पेंच सिखाए हैं। अस्पताल के सीमित क्षेत्र में आसपास उपलब्ध वस्तुओं का प्रयोग करके एंडी ने कुछ दिलचस्प एक्शन सीक्वेंस भी फिल्माने में कामयाबी हासिल की। फिल्म के बाकी कलाकारों में नेहा धूपिया के साथ फिल्म की कहानी और इसके निर्देशक ने बहुत अन्याय किया है। रुक्मिणी मैत्रा का फिल्म में होना, न होना एक जैसा है। इन सारी कमजोर कड़ियों के बीच फिल्म ‘सनक’ अगर किसी एक बात के लिए याद रखी जाएगी तो वह है फिल्म में विलेन बने चंदन रॉय सान्याल का अभिनय। चंदन की खुशबू हिंदी सिनेमा अब तक ठीक से महसूस नहीं कर सका है। और, इसमें घाटा हिंदी सिनेमा का ही ज्यादा है।