दुख तो हर घर में जाता है/हर घर से उसका नाता है...। निर्देशक संजय त्रिपाठी की फिल्म ‘क्लब 60’ को देखते हुए साहित्य अकादमी पुरस्कार के सम्मानित शायर मोहम्मद अल्वी का यह शेर याद आता है।
फिल्म दुख के इर्द-गिर्द घूमती और पल-पल दुख को बुनती है। बीच-बीच में कुछ दृश्य आते हैं, जब गुदगुदाने की कोशिश होती है, लेकिन घड़ी के कांटे घूमते हुए फिरदर्द पर ठहर जाते हैं।
हिंदी में ऐसी फिल्म बनाना जोखिम का काम है, जिसमें नौजवान ऊर्जा न हो। जहां जिंदगी के प्राइम टाइम की छवियां गायब हो।
‘क्लब 60’ ऐसा ही जोखिम है, जो रिटायर्ड लोगों की जिंदगी के दिनों को पर्दे पर उतारती है। फिल्म जिंदगी के दुखों पर सवाल भी उठाती है और जवाब भी देती है...जो भी है, बस यही इक पल है। इसलिए इसे खुलकर जीयो। जी भर कर जीयो।
‘क्लब60’ एक हंसते-खेलते परिवार के एक हादसे में टूट जाने से शुरू होती है। एक डॉक्टर दंपती अपने इकलौते बेटे को खो देते हैं। पिता इस कदर बिखर जाता है कि जीना ही नहीं चाहता। वह कलाई की नस काट लेता है।
पत्नी उसे बचाती है। लेकिन डॉक्टर में जीने का उत्साह अब बाकी नहीं। वह अब उस शहर में भी नहीं रहना चाहता, जिसने बेटा छीन लिया। पति-पत्नी पूना से मुंबई आ जाते हैं।
यहां उन्हें एक हंसमुख पड़ोसी मिलता है, मन्नूभाई शाह (रघुवीर यादव)। शाह डॉ.तारिक (फारुख शेख) को इस बात के लिए राजी करता है कि वे उसके साथ चलें और क्लब 60 की सदस्यता ले लें। इस क्लब में उनके हमउम्र और भी हैं। वक्त कट जाएगा। लेकिन डॉक्टर के लिए वक्त ठहर चुका है! हादसे का पल बीतता ही नहीं...!!
फिल्म के मुख्य पात्रों के साथ पांच ऐसे किरदार हैं, जो हंसते-खेलते दिखते हैं। लेकिन उनकी जिंदगी में गम साये की तरह साथ लगे हैं। किसी की पत्नी छोड़ गई। किसी की संतानें। किसी का बेटा होकर भी न होने जैसा है। ...और मनसुख भाई, जो इन सब को हमेशा हंसाता-गुदगुदाता रहते हैं, उनका तो दुनिया में कोई है ही नहीं!
इन सबकी शरारतें माहौल को लगातार हल्का बनाने की कोशिश करते हुए डॉ. तारिक को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से यही समझाने की कोशिश करती है कि जिंदगी किसी हाल में ठहर नहीं सकती। उसे आगे बढ़ना ही है।
फिल्म की शुरुआत में पैदा हुआ तनाव धीरे-धीरे कम होता है। लेकिन एक-एककर सभी पात्रों के साथ ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, जो दुख के पलों को उभार देती हैं। पांचों दोस्त मिलकर बार-बार दुख को हराते हैं। हालांकि ये बूढ़े थोड़े चुलबुले हैं, लेकिन ‘शौकीन’ के अशोक कुमार, ए.के.हंगल और उत्पल दत्त की तरह नहीं।
इस फिल्म के विषय की कामयाबी को बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों से नहीं मापा जा सकता। लेकिन फिर भी इसकी मुश्किल यह है कि मुख्य कहानी के बीच आने वाले अन्य कथानक एपिसोड की तरह लगते हैं।
सहायक पात्रों के साथ हुई घटनाएं भी इस तरह नहीं होतीं कि वे सीधे डॉक्टर दंपती की जिंदगी में हुए हादसे के दुख के बराबर खड़ी दिखें। हर पात्र अपनी कहानी के साथ सामने आकर कुछ देर में पीछे चला जाता है। एक के बाद आप दूसरे का इंतजार करते हैं। यह फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी है। कहीं न कहीं आप जान जाते हैं कि आगे क्या होने वाला है।
फिल्म का सबसे सशक्त पक्ष सारिका हैं। ऐसा नहीं कि वह पूरी फिल्म में छाई हैं, लेकिन उनके लिए लिखा गया किरदार और उनका अभिनय तारीफ के काबिल है। मुख्य कथा के पूरे घटनाक्रम में वह असल जीवन की नायिका की तरह उभरती हैं।
वाकई एक ऐसी मां, जिसने बेटा खोया तो है लेकिन पति टूटकर बिखर न जाए, इसलिए वह अपने दुख को उजागर नहीं करती। फिल्म में एक पूरा दृश्य सारिका के हिस्से में है, जो उनके इस दर्द को बयान करता है। आपकी आंखें नम कर देता है।
फारुख शेख सधे हुए अभिनेता हैं और उनके चेहरे, बॉडी लैंग्वेज और बात करने के अंदाज में आप जवान बेटे को खोने का दुख महसूस करते हैं। हालांकि इन दोनों से अलग पूरी फिल्म में जो शख्स अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है, वह हैं रघुवीर यादव। बांसुरी बजाते हुए मस्तमौला गुजराती मन्नूभाई शाह के रूप में वह अपने चाहने वालों को लंबे समय तक याद रहेंगे।
फिल्म समाज के उस वर्ग के बुजुर्गों की कहानी कहती है, जो संपन्न हैं। जिनके पास अपने फ्लैट, बंगले, कार और बैंक बैलेंस है। जो सुबह क्लब में टेनिस खेल कर, दिन में टैरेस पर समंदर की ठंडी हवा खाकर और शाम को बोतल खोलकर अपना गम भुला सकते हैं।
यह वर्ग बहुत छोटा-सा है। इनसे अलग और बहुत बड़ा वर्ग उन बुजुर्गों का है, जो नौकरियों से रिटायरमेंट के बाद भी जिम्मेदारियों से रिटायर नहीं हुए हैं। जिनके कंधों पर परिवार का बोझ है। जिनका संघर्ष अभी जारी है। जो जिंदगी की आंखों में आंखें डाल कर उससे पंजा लड़ा रहे हैं। जिन्होंने हार नहीं मानी है। जो कभी ‘क्लब 60’ के सदस्य नहीं बनेंगे।