फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

धर्म संकट में: फिल्म देखने से पहले पढ़िए इसकी समीक्षा

विज्ञापन
विज्ञापन
धर्म क्या है? किसके लिए है? इस सवाल के अनेक जवाब हैं। विद्वानों की लंबी बहसें हैं। हरि अनंत, हरि कथा अनंता। इस कथा में फिल्म 'धर्म संकट में' को भी जोड़ लीजिए। हिंदू परिवार में मुस्लिम बच्चे के लालन-पालन की संजीदा कहानियां अब्दुल्ला (1980) से लेकर धर्म (2007) तक पर्दे पर आ चुकी हैं। परंतु धर्म संकट में का टोन व्यंग्यात्मक है। यह 2010 की पश्चिम में बनी फिल्म द इनफिडेल से प्रेरित है।
विज्ञापन


हाल के वर्षों में आप ओ माई गॉड और पीके जैसी फिल्मों में हिंदू धार्मिक आडंबरों पर विमर्श देख चुके हैं। जिन्हें लगता है कि फिल्मकार इस्लाम को छूने से डरते हैं, वे धर्म संकट में देख सकते हैं। फिल्म कुछ इस्लामी रुढ़ियों पर चुटकी लेते हुए पॉपुलर सवाल सामने रखती है।

ये है फिल्म की कहानी

मसलन, कहीं आतंकियों द्वारा विस्फोट किए जाने पर हर मुस्लिम को क्यों शक की निगाह से देखा जाता है? मुस्लिमों से वतनपरस्ती साबित करने की उम्मीद क्यों की जाती है। इन सवालों को छूती हुई कहानी मुख्यतः नायक धरमपाल (परेश रावल) पर केंद्रित रहती है। जो धर्म से ऊपर कर्म को मानता है। मगर जल्द ही पता चलता है कि उसे बचपन में हिंदू परिवार ने गोद लिया था, जबकि उसके जैविक माता-पिता मुस्लिम थे। मां मर चुकी है। पिता जिंदा हैं। वह पिता से मिलना चाहता है। जो बीमार हैं और अपना सब कुछ एक यतीमखाने को दान कर चुके हैं।

यतीमखाने के इमाम साहब (मुरली शर्मा) धरमपाल को मजबूर करते हैं कि वह इस्लामी रीति-रिवाज सीखे और मजहबी मुसलमान के रूप में पिता के सामने आए। ताकि बीमार पिता को उसके हिंदू होने का च्सदमाज् न लगे।

आडंबरों की धज्जियां उड़ाने वाला मजबूर धरमपाल घुटने टेकने लगता है। उधर उसका बेटा उस पर धार्मिक हिंदू होने का ढोंग करने का दबाव डालता है क्योंकि जिस लड़की से वह प्यार करता है, उसका पिता नील बाबा का भक्त है। धरमपाल धर्म के दो पाटों में पिसने लगता है। नसीरुद्दीन शाह नील बाबा बने हैं जो अपने संप्रदाय के मुखिया हैं और कट्टरता को बढ़ावा देते हैं। नील बाबा का आपराधिक अतीत है।
विज्ञापन

सिर्फ इंसान होने से काम नहीं चल सकता?

यह फिल्म धर्म के नाम पर इसके लीडरों के इरादों पर सवाल उठाती है। मगर ओ माई गॉड और पीके के बाद इस फिल्म में वैचारिक स्तर पर कुछ खास नयापन नहीं दिखता। वास्तव में यह एक व्यक्ति के धर्म संकट में पड़ने की कहानी ज्यादा है। क्या हिंदू या मुस्लिम होने से जीवन पर कोई खास फर्क पड़ता है?

सिर्फ इंसान होने से काम नहीं चल सकता? फिल्म इंसानियत को बड़ा धर्म मानने का आग्रह करती है। परेश का अभिनय अच्छा है। अनु कपूर और मुरली शर्मा अपनी भूमिकाओं में फिट हैं। नसीर को निर्देशक ने ड्रामाई बना दिया है, जो निराश करता है। गीत-संगीत यहां खास नहीं है। फिल्म के दूसरे हिस्से में निर्देशक की पकड़ ढीली पड़ जाती है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें