हिंदी फिल्मों में ऐसी कोशिशें कम ही हैं जिनमें इस्लाम, कुरान और मुसलमानों को लेकर फैली भ्रामक बातों को दूर करने के ईमानदार प्रयास हों। निर्देशक हसनैन हैदराबादवाला की फिल्म ‘या रब’ सच्चाई से यह काम करती है।
फिल्म इस्लाम, कुरान और मुस्लिमों को लेकर भ्रम बातें फैलाने वालों को आईना दिखाती है। फिल्म के पीछे मूल विचार यही है कि कैसे दुनिया में यह झूठ फैलाया गया कि इस्लाम आतंकवाद का पोषण करता है। जबकि हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत है।
पवित्र कुरान की एक भी आयत आतंकवाद के पक्ष में नहीं है। फिल्म तथाकथित और स्वयंभू मौलानाओं तथा राजनीतिज्ञों के द्वारा मुस्लिमों को भड़का कर अपनी दुकाने चलाने के षड्यंत्रों का भी पर्दाफाश करती है।
फिल्म दिल्ली हाईकोर्ट में 2011 में हुए विस्फोट से शुरू होती है, जिसकी जांच एटीएस इंस्पेक्टर रणविजय सिंह (एजाज खान) के पास है। यहीं से उसे पता चलता है कि जल्द ही लखनऊ में आतंकी किसी सार्वजनिक जगह को दहलाने की साजिश रच रह हैं।
रणविजय और उसकी टीम इस हादसे को रोकने की कोशिश करती है, लेकिन नाकाम रहती है। इसी दौरान फिल्म में मौलाना जिलानी (अखिलेंद्र मिश्र) का किरदार उभरता है कि किस तरह से वह पड़ोसी देश के इशारे पर इस षड्यंत्र को रचता है।
इस षड्यंत्र का शिकार मौलाना की बहू भी होती है। फिल्म में एक तरफ जहां इस समाज की तरक्कीपसंद तस्वीर सामने आती है, वहीं दूसरी तरफ यह भी दिखाया गया है कि कैसे कम पढ़े-लिखे लोगों को धर्म के नाम पर उकसाया जाता है।
निर्देशक अपनी कोशिश में कामयाब है। ‘या रब’ इस्लाम को सही तस्वीर में पेश करने का सच्चा प्रयास है। साथ ही यह उन लोगों को समझाने की कोशिश भी है जो गलत हाथों में पड़ कर आसानी गुमराह हो जाते हैं। फिल्म का संदेश साफ है कि खुद अपनी कोशिशों के बगैर कोई व्यक्ति, कोई समाज तरक्की नहीं कर सकता।