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क्या 'बबलू' सिर्फ कंडोम से ही हैपी है

Fri, 07 Feb 2014 01:13 PM IST
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई
'बबलू हैपी है' का ट्रेलर तो आपने देखा ही होगा। वही कंडोम वाला। पढ़िए इस फिल्म की समीक्षा।


इस फिल्म के प्रोमो आप टीवी और यू-ट्यूब पर चल रहे हैं। एक में केमिस्ट की दुकान पर कंडोम मांगते युवक का कॉमेडी सीन है। दूसरे में बिस्तर में लेटी युवती से युवक कहता है, ‘ब्रा नहीं पहनोगी तो सुनामी नहीं आ जाएगी।’

पहली चेतावनी यह कि प्रोमो देखकर सिनेमाहॉल जाएंगे तो पछताएंगे। फिल्म न सेक्स कॉमेडी है, न कॉमेडी। दूसरी चेतावनी यह कि अगर निर्देशक नीला माधब पांडा की ‘आइ एम कलाम’ की ख्याति से प्रभावित होकर आपने यह फिल्म देखने का फैसला किया तो हाथ मलेंगे। यह फिल्म किसी लिहाज से उस स्तर की नहीं है।


फिल्म देखते हुए आप समझ ही नहीं पाते कि आखिर क्या हो रहा है। तीन दोस्त अपनी मस्ती में हैं। लेकिन एक की रईस और नकचढ़ी प्रेमिका उसे सदा डांट रही है कि वह दोस्तों की संगत में बिगड़ रहा है। यहां एक नई लड़की की एंट्री होती है, जो प्रेम का त्रिकोण बनाती है।

अपनी चचेरी बहन की शादी में प्रेमिका प्रेमी को मनाली ले जाती है तो वह दोस्तों के साथ पहुंचता है। लेकिन देर से। उसे फिर डांट पड़ती है। कुछ घटनाओं के बाद अचानक ये सभी कलाकार एक एनजीओ से जुड़ जाते हैं और कहानी का नया ट्रेक खुलता है। एनजीओ एचआईवी पॉजिटिव लोगों को जिंदगी जीने का हौसला देता है। तब पता चलता है कि निर्देशक वह सारी बातें कर रहा है, जो सरकारी विज्ञापनों में वर्षों से चल रही है।

फिल्म की कहानी दूसरे हिस्से में रफ्तार पकड़ती है, परंतु तब तक आप इतना ऊब चुके होते हैं कि सो भी सकते हैं। कहानी के साथ स्क्रिप्ट और संवाद भी ढीले हैं। एरिका फर्नांडिस, सुमित सूरी और प्रीत कमल का अभिनय जरूर ध्यान आकर्षित करता है।
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एड्स से बचाव के लिए कंडोम कारगर हथियार है, इसलिए कुछ दृश्यों में कंडोम के इस्तेमाल पर जोर है। फिल्म देख कर आप आश्चर्य करेंगे कि यहां तो बबलू नाम का कोई दिखा ही नहीं। बबलू से निर्देशक का क्या आशय है, कब वह हैप्पी है, क्यों वह हैप्पी है... ये सवाल आपको उलझाएंगे। फिल्म कतई हैप्पी नहीं करती। बेहतर हो कि इस फिल्म से सुरक्षित संबंध ही रखा जाए।
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