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जॉली एलएलबीः कॉमेडी के अलावा भी बहुत कुछ

Fri, 17 Feb 2017 11:03 AM IST
रोहित मिश्र
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कॉमेडी से लबालब भरे प्रोमो देखकर 'जॉली एलएलबी' देखने गए दर्शकों को पर्दे पर एक अलग ही फिल्म ‌मिलेगी। यह फिल्म प्रोमो से कहीं ज्यादा सधी और सुलझी हुई हैं। फिल्म में कॉमेडी जरूर है लेकिन यह एक तरह का व्यंग्य हैं। पुलिस, व्यवस्‍था, न्याय प्रक्रिया और उससे जुड़े लोगों पर व्यंग्य। आप चाहें तो इस व्यंग्य पर हंस सकते हैं।
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यह फिल्म सिर्फ वकीलों की स्थिति, कानूनों के दुरुपयोग और लचर कानून व्यवस्‍था पर मसखरी करने के लिए नहीं बनी है। फिल्म एक उदेश्य के साथ चलती है। जाहिर है पिछली ढेरों हिंदी फिल्मों की तरह ही यहां भी कोर्ट रूम में गलत और सही की व्याख्या करने की कोशिश की गयी है। बस इस फिल्म में यह कोशिश थोड़ी फिल्मी कम है। इसका कम फिल्मी होना ही इसकी यूएसपी है।

हर दौर में ऐसी फिल्में बनती रही हैं जहां एक ताकतवर अपराध करता है। कमजोर अपना केस कोर्ट में तो ले आता है लेकिन वह न सिर्फ कोर्ट से केस हारता बल्कि अपमानित भी होता है। बाद में कोई हीरो नुमा वकील सत्य का थामन थामकर कमजोर को न्याय दिलाता है। 'जॉली एलएलबी' में यही एक्सरसाइज फिर से दोहरायी गयी है।
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बस फर्क यहां इतना है कि इस बार कोर्ट के नजारे बदले हुए हैं, वकीलों और जज का स्टाईल भी। 'ऑर्डर-ऑर्डर' और 'ऑब्‍जेक्‍शन ओवररूल' जैसे घिसे-पिटे शब्दों के अलावा दर्शकों को कुछ नए शब्द भी यहां मिलते हैं। कुल मिलाकर 'जॉली एलएलबी' एक दिलचस्प सटायर है जो मनोरंजन के साथ एक मैसेज देने की भी कोशिश करती है।

कोर्ट के किस्से, गवाहों को खरीदने की साजिश

फिल्म में कॉस्ट रील चलने के साथ ही एक घटना दिखायी जाती है। शराब के नशे में कुछ युवा तेज रफ्तार की अपनी विदेशी गाड़ी को फुटपाथ पर चढ़ा देते हैं। फुटपाथ पर सो रहे 6 लोग मौके पर मारे जाते हैं। कॉस्ट रील खत्म होते ही जॉली (अरशद वारसी) की कहानी शुरू होती है। वह मेरठ कोर्ट में बतौर वकील प्रैक्टिस कर रहा होता है। वहां उसकी प्रैक्टिस नहीं चलती है।

वह दिल्ली आ जाता है। यहां दिल्ली की जिला न्यायालय में एक चर्चित केस पर सुनवायी चल रही होती है। शराब के नशे में धुत जिस लड़के ने छह लोगों को कुचलकर मारा था वह एक बड़े घर का लड़का होता है। दिल्ली के बड़े वकील राजपाल (बोमन ईरानी) उसका बचाव कर रहे होते हैं। वह दो हेयरिंग में ही अपने मुक्लिवल को बेगुनाह साबित कर देते हैं।

यहीं पर जॉली की इंट्री होती है। ‌प्रैक्टिस में अब तक असफल रहा जॉली कोर्ट में इस फैसले के खिलाफ जनहित या‌चिका दायर करता है। यह केस फिर शुरू होता है। राजपाल एक चाल चलके जॉली को 20 लाख रूपए में खरीद लेता है। जॉली इससे खुश भी हो जाता है। जॉली की प्रेमिका संध्या (अमृता राव) को यह बात अखरती है कि उसने कमजोर का पक्ष लेने के बजाय दलाली की है। यहीं से जॉली की आंखे खुलती हैं, आम तौर पर जैसा कि हर फिल्म में होता है उसकी आँखें भी इंटरवल के आसपास ही खुलती हैं।

अब वह अपने केस के लिए सुबूत इकट्ठा करना शुरू करता है। फिल्म का क्लाइमेक्स राजपाल की चालों और जॉली का ईमानदार कोशिश के बीच जूलझा रहता है। यहां पर जज त्रिपाठी (सौरभ शुक्ला) एक जरूरी भूमिका अदा करते हैं। तथ्यों के आधार पर कमजोर चल रहे इस मुकदमे में त्रिपाठी कुछ ऐसा करते हैं इस केस की दिशा ही बदल जाती है।

बोमन ने किया कमाल का अभिनय

फिल्म में सबसे जबर्दस्त अभिनय बोमन ईरानी का रहा है। एक एरेस्ट्रोकेट वकील की भूमिका को उन्होंने शानदार तरीके से जिया है। दर्शकों को लगता ही नहीं कि यह व्यक्ति पेशे से अभिनेता है और यह वकील की ऐक्टिंग भर कर रहा है। यदि मील के पत्‍थर जैसे किसी मुहावरे पर आप विश्‍वास करते हैं तो यह भी विश्‍वास कीजिए कि य‌ह फिल्म बोमन के लिए मील का पत्‍थर है।

दर्शकों के जेहन में अरशद वारसी की इमेज एक मसखरे की है। फिल्मकार इस बात से वाकिफ हैं। इसलिए जहां-जहां भी कॉमेडी की थोड़ी गुंजाइश दिखी अरशद आगे कर दिए गए हैं। अरशद की इस बात की तारीफ करनी होगी कि अपनी कॉमेडी इमेज के साथ-साथ एक भावुक और जज्बाती वकील का किरदार भी उन्होंने अच्छे से निभाया है।

जज त्रिपाठी का किरदार कर रहे सौरभ शुक्ला अपने सेंस ऑफ ह्रयूमर के साथ अपनी हाजिर-जवाबी से भी प्रभावित करते हैं। अमृता राव के पास करने को ज्यादा था नहीं इसलिए उन्होंने जितना भी किया है अच्छा किया है। मनोज पहवा, मोहन अगाशे और हर्ष छाया छोटे-छोटे रोल में अच्छे लगे हैं।

सुभाष कपूर की ऊंची छलांग

फिल्म का निर्देशन कर रहे सुभाष कपूर ने इसके पहले 'फंस गए रे ओबामा' फिल्म का निर्देशन किया था। इस फिल्म के जरिए सुभाष ने ऊंची छलांग लगायी है। किसी भी फिल्म निर्देशक के लिए सही गलत की व्याख्या करने के साथ उन्हीं दृश्यों पर मसखरी करवना आसान नहीं होता।

इस मामले में सुभाष तारीफ के पात्र हैं कि उन्होंने गंभीरता, हास्य और जवाबदेही की डोर संतुलन के साथ साध रखी है। कहीं-कहीं जब यह फिल्‍म गरीब को न्याय दिलाने की बात बहुत दिलचस्पी लेकर कहती है तो 70 और 80 के दशक की फिल्मों जैसी थोड़ी पुरानी पड़ जाती है।

फिल्म की ताजगी कोर्ट और वहां की प्रक्रिया को अलग तरह से दिखाने में हैं। जहां जज अपने काम के दौरान ही वकील से सस्ते दर पर अपार्टमेंट दिलाने की बात करते हैं। जहां गवाह को मुर्गा बनाया जाता है। यह फिल्म दिल्ली के चर्चित 'संजीव नंदा, बीएमडब्लू हिट ऐंड रन केस' पर आधारित हैं।

सुभाष कपूर ने इस केस की रिर्पोटिंग की थी। उनकी इस रिर्पोटिंग के अनुभव फिल्म में दिखते हैं। हां, यह फिल्म वहां थोड़ी बचकानी दिखती है जब गोरखपुर और मेरठ जैसे शहरों को उत्तराखंड के किसी हरे-भरे गांव जैसा दिखाया जाता है।

गाने बस ठीक-ठाक

फिल्म के कुछ गाने फिल्म के मूड के हैं और कुछ विपरीत। जैसे "दारू पीके न नचना" गाना यदि न होता तो बेहतर होता। इसके उलट "हंस की चाल", "अजनबी" और "झूठ बोलिया" जैसे गाने जरूरत के मुताबिक दिलचस्प हैं। बप्पी लहरी पर फिल्माया गया एक गाना "मेरे तो लॉ लग गए" गाना फिल्म में नहीं है। एक म्यूजिक एलबम के रूप में 'जॉली एलएलबी' प्रभावित नहीं करती।
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क्यों देखें

न्याय प्रक्रिया पर एक दिलचस्प फिल्म के लिए। जो फिल्म आपका मनोरंजन करने के साथ सोचने के लिए आपके हाथ कुछ मुद्दे भी थमा देती है।

क्यों न देखें

यदि आप इसे ठेठ प्रियदर्शन या डेविड धवन स्टाईल की कॉमेडी फिल्म सोचकर जा रहे हों तो।
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