अपने प्रोमो और पोस्टर से हल्की-फुल्की सी लगने वाली भारत की यह पहली जॉम्बी फिल्म हकीकत में एक मजेदार और बांधकर रखने वाली फिल्म है। फिल्म अपने संवादों और स्थितियों से एक नए किस्म का हास्य क्रिएट करती है। यह जॉम्बी फिल्म बाद में है, कॉमेडी फिल्म पहले।
फिल्म गोवा के आइसलैंड में फंसे कुछ दोस्तों की कहानी है। ऐसी कहानियां हॉलीवुड हजारों बार-बार अलग स्थितियों के साथ रच चुका है। फिल्म की खूबी यह है कि यह अपने आप को हॉलीवुड की उन फिल्मों की नकल होने से बचाती है। जॉम्बी एक तरह के भूत हैं, तो कायदे से यहां भूतों के डर को हिंदी की हॉरर फिल्मों के पारंपरिक बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ पेश करना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं होता।
यह फिल्म जॉम्बीज से आपको डराती जरूर है पर उनका माखौल भी उड़ाती है। जॉम्बीज से जितना फिल्म के पात्र डर रहे होते हैं उतना ही दर्शक। फिल्म का असल मजा डर के बीच हंसी के छोटे-छोटे किस्सों में है। इन किस्सों के डायलॉग शहरी युवाओं को ध्यान में रखकर लिखे गए जोकि उन्हें जरूर अच्छे लगेंगे।
क्या हैं यह जॉम्बी?
जॉम्बी एक तरह के जिंदा मुर्दे हैं। उनकी चेतना और इमोशन खत्म हो चुके होते हैं। उन्हें इंसान के मांस की भूख होती है। कुंद दिमाग के यह जिंदा मुर्दे बहुत-बहुत धीमे लुढ़कते हुए चलते हैं। आपस में एक-दूसरे पर टूटने के बाद इन्हें जिंदा लोगों की तलाश होती है। हॉलीवुड में जॉम्बी को अलग-अलग तरीके से दिखाया है। यह भारत की पहली जॉम्बी फिल्म है। इस फिल्म में लोग एक अजीब तरह का ड्रग्स लेने की वजह से जॉम्बी बन गए होते हैं।
कहानी जॉम्बीज से बचने की
हार्दिक (कुणाल खेमु), लव (वीर दास) और बनी (आनंद तिवारी) गोवा पहुंचते हैं। हार्दिक नौकरी जाने और लव गर्लफ्रेंड के डंप करने के दुख को खत्म करने के लिए गोवा जाते हैं। बनी, को वहां एक प्रजेंटेशन देना होता है। गोवा में पहुंचकर इनकी एक अलग जिंदगी शुरू होती है। लव को लूना (पूजा गुप्ता) नाम की लड़की मिलती है, जोकि लव की फेसबुक फ्रेंड होती है। लूना, लव और उनके दोस्तों को गोवा में संमदर के बीच एक आइलैंड पर होने वाली रेव पार्टी के लिए इनवाइट करती है।
यह सभी उस रेव पार्टी में पहुंचते हैं। उस रेव पार्टी में एक नई किस्म का ड्रग्स परोसा जाता है। इन चार के अलावा कुछ और लोगों को छोड़कर बाकी उस स्पेशल ड्रग्स को लेते हैं। उस ड्रग्स का नशा इतना अजीब होता है कि उसे लेने वाले लोगों का दिमाग शून्य हो जाता है। वह एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं। इन्हें फिल्म में जॉम्बी कहा गया है। तो यही जॉबी फिल्म के इन्हीं चार पात्रों के पीछे पड़ते हैं। इन्हें बचाने के लिए बोरिस (सैफ अली खान) आता है।
दिल्ली का रहने वाला बोरिस पिछले कुछ समय रसियन लोगों के साथ रह रहा होता है और उसकी बोली और लुक रसियन जैसे हो जाते हैं। उसके पास इन जॉम्बी से निपटने के तोड़ हैं। फिल्म का क्लाइमेक्स इसी बात में है कि यह जिंदा पांच लोग करीब 1300 जॉम्बीज से बचकर वापस शहर कैसे लौटते हैं।
सभी की ऐक्टिंग खूबसूरत
इस फिल्म में हर पात्र अपने रोल में रमा हुआ है। वीर दास परफेक्ट सिचुवेशनल कॉमेडी के लिए जाने जाते हैं। 'देल्ही बेली' के बाद उन्होंने एक बार फिर अच्छा अभिनय किया है। फिल्म की धुरी कुणाल खेमु के इर्द-गिर्द घूमती है। उनकी स्वाभाविक ऐक्टिंग चटपटे संवादों का मजा और भी बढ़ा देती है। आनंद तिवारी टेढ़े दोस्तों के साथ एक आदर्शवादी सीधे-साधे दोस्त की भूमिका में अच्छे लगते हैं।
पूजा गुप्ता को लगता है कि लड़कों की टोली में एकमात्र लड़की वाली भूमिकाएं ही ऑफर हो रही हैं। वैसे वह इस फिल्म में कहीं-कहीं अच्छी लगती हैं लेकिन तब नहीं जब वह सैफ अली खान को ड्रग्स के दुष्परिणामों का प्रभाव बता रही होती हैं। सैफ अली खान की भूमिका कम है लेकिन जब वह पर्दे पर होते हैं तब वह ही छाए रहते हैं। रसियन स्टाईल से अंग्रेजी बोलना भी उन पर अच्छा लगता है, लुक तो उनका अलग है ही।
निर्देशकद्वय की सबसे बढ़िया फिल्म
अब्बास-मस्तान की तरह ही राज और कृष्णा डीके मिलकर फिल्म बनाते हैं। अपनी पिछली फिल्मों '99' और 'शोर इन द सिटी' में इस जोड़ी ने यह दिखाया है कि वह इसी युग में रहकर उस युग से रची जा रही कहानियों से अलग कुछ गढ़ सकते हैं। इस निर्देशक जोड़ी की यह अब तक की यह सबसे अच्छी फिल्म है। फिल्म की खूबसूरती उसके संवादों में है। शहरी मध्यमवर्ग को फोकस करते हुए लिखे गए यह संवाद नयी पीढ़ी को खूब रास आएंगे।
कई जगह डबल मीनिंग होते हुए भी यह भद्दे या बचकाने नहीं लगते। निर्देशक ने इस बात का खास ख्याल रखा है कि यह फिल्म भुतही न बन जाए। इसलिए डर को भी एक हास्य की तरह दिखाया गया है। यह भारत की पहली जॉम्बी फिल्म है। दर्शक जॉम्बी के बारे में जाने इसके लिए भी कुछ मनोरंजक संवाद गढ़े गए हैं। जोकि जानकारी बढ़ाते हैं लेकिन 'सूचना' नहीं लगते।
गाने सुनने लायक
फिल्म की तरह फिल्म का संगीत ताजा-ताजा सा है। रेव पार्टी का गाना "स्लोली-स्लोली" बेहतरीन तरीके से गाया और कंपोज किया गया है। गाने की एक लाइन "ऐसा नाकर-नाकर मेरे यार" सुनने में जादू सी जान पड़ती है। "ब्लडी खूनी मंडे" नौकरी पेशा की उस मजबूरी को दिखाता है जिसमें उन्हें रविवार की छुट्टी के बाद सोमवार कोकाम पर जाना पड़ता है। अमित भट्टाचार्य ने इसकी शानदार लिरिक्स लिखी हैं। "बाबजी की बूटी" गाना भी आज के चलताऊ गानों से बिल्कुल अलग शैली का है।
क्यों देखें
यदि आप एक अच्छी और नई किस्म की मनोरंजक फिल्म देखना चाहते हैं।
क्यों न देखें
यदि आप इस फिल्म से ऐसे हॉरर की उम्मीद कर रहे हों जो फिल्म के बाद भी आपको रात में डराने आए।