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फिल्म और दर्शक के रिश्ते बयान करती है 'बांबे टाकीज़'

Sat, 04 May 2013 11:29 AM IST
रोहित मिश्र
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हिंदी सिनेमा अब इतना मैच्योर हो चुका है कि अब वह खुद पर इतराने के साथ अपनी खिल्ली भी उड़ा सके। यह खिल्ली उन खोखले सपनों की है जो फिल्म देखने की वजह से पैदा होते हैं और उस राह चलते ही टूटकर बिखर भी जाते हैं। हिंदी सिनेमा के 100 साल पूरे होने पर चार निर्देशकों द्वारा बनायी गयी 'बांबे टॉकीज' फिल्म इसी फिल्मी रिश्ते को परिभाषित करती है।
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यह फिल्म चार छोटी-छोटी कहानियों का गुलदस्ता है। यह कहानियां ऐसी नहीं हैं जिनसे हिंदी सिनेमा के अलग-अलग दौर रिफलेक्ट हों। यह कहानियां हमारे खुद के जीवन में फिल्म के इनवाल्वमेंट को डिफाइन करती हैं। इन चार कहानियों में आपस में कोई समानता भी नहीं है। लेकिन इन चार में से तीन कहानियां कुर्सी पर बैठे दर्शक और पर्दे पर चल रही फिल्म के बीच एक अदृश्य तंतु को अंडरलाइन करती हुई चलती हैं। फिल्मश में सबसे पहली आयी करन जौहर की कहानी समलैंगिकता की बात गंभीर तरीके से करती है।

एक फिल्म के रूप में यह एक बोल्ड और बेहद खूबसूरत फिल्म है पर जब बात 100 साल के उपलक्ष्य पर सिनेमा बनाने की हो तो यह फिल्म उस विषय के साथ मैच नहीं करती। बाकी बची तीन कहानियां अनुराग कश्यप, जोया अख्तर और दिबाकर बनर्जी की हैं। यह तीनों ही कहानियां यह दिखाती हैं कि फिल्में और फिल्मी कलाकार हमारी जिंदगी, हमारे सपने और हमारी सोच को कितनी प्रभावित करती हैं। यदि मनोरंजन की दृष्टि से देखें तो अनुराग कश्यप की कहानी हमें अपने बीच की लगती है। जिस पर हंसते भी हैं और उदास भी होते हैं।
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कहानियां चार, पर सपने हजारों

फिल्म की पहली कहानी गायत्री (रानी मुखर्जी) और देव (रणदीप हुड्डा) की है। इस फिल्म को करन जौहर ने निर्देशित किया है। गायत्री और देव की जिंदगी में आविनाश (साकिब सलीम) आ जाता है। वह समलैंगिक है। अविनाश यह बात भांप लेता है कि देव भी उसके जैसा ही है। यह बात जब गायत्री को पता लगती है तो पूरा परिवार तहस-नहस हो जाता है।

दिबाकर बनर्जी निर्देशित दूसरी कहानी पुरेन्द्र (नवाजुद्दीन सिद्दिकी) की है। पुरेन्द्र अपनी बीमार बेटी को फिल्मी सितारों के किस्से सुनाया करता है। पुरेन्द्र एक कलाकार भी है। उसे एक दिन अचानक मुंबई में चल रही शूटिंग में एक्सट्रा का मौका मिल जाता है। शूटिंग में छोटा सा किरदार निभाने के बाद पुरेन्द्र को इतनी खुशी मिलती है जिसे वह शब्दों में भी बयां नहीं कर पात। यह कहानी कुंठा और सपनों को एक साथ लेकर चलती है।

जोया अख्तर निर्देशित तीसरी कहानी विकी (नमन जैन) की है। विकी के पिता चाहते हैं कि विकी फुटबाल खेले लेकिन उसे कैटरीना कैफ पसंद हैं और वह उसके जैसे ही शीला का डांस करना चाहता है। वह अपनी बहन की फ्रॉक पहनता है और मां की लिपिस्टिक लगाता है। उसके सपने में कैटरीना कैफ आती हैं जो उसे बताती हैं कि अपने सभी सपने सबके साथ शेयर नहीं करने चाहिए।

चौथी कहानी इलाहबाद के रहने वाले विजय (विनीत कुमार) की है। इसे अनुराग कश्यप ने निर्देशित किया है। विजय इलाहाबाद से अमिताभ बच्चन को मुरब्बा खिलाने के लिए मुंबई आया है। अमिताभ बच्चन से मिलने के लिए उसे कौन-कौन से पापड़ बेलने पड़ते हैं इस बात को फिल्म मनोरंजक और कटाक्ष के अंदाज में दिखाती है।

निर्देशक ही नायक

'बॉबे टॉकीज' दरअसल कलाकारों की नहीं निर्देशकों की फिल्म है। हर फिल्म की एक अलग पिच और फ्रीक्वेंसी है। करन जौहर अपनी पिछली हर फिल्म में समलैंगिकता को हास्य के अंदाज में दिखाते रहे हैं। इस बार उन्होंने इस विषय को गंभीर तरीके से दिखाया है। एक फिल्म के रूप में यह एक प्रभावी फिल्म है लेकिन यह हिंदी सिनेमा के 100 साल पूरे होने के उपलक्ष्य पर बनायी गयी फिल्म वाली अपेक्षाएं पूरी नहीं करती।

दिबाकर बनर्जी की फिल्म एक इंटलैक्चुअल फिल्म है। यह फिल्म यदि प्रभावी बन पायी है तो इसके पीछे की वजह नवाजुद्दीन रहे हैं। कई दृश्यों में खामोश रहकर भी उन्होंने खूबसूतर अभिनय किया है। जोया अख्तर की कहानी सही क्या है और अच्छा क्या है के अंतर को चुटीले अंदाज में बयां करती है। अंतिम कहानी अनुराग कश्यप की है। इस कहानी का प्लाट सबसे दुरुस्त और मनोरंजक है। बिना किसी स्टारकॉस्ट के छोटे-छोटी घटनाओं के जरिए अनुराग ने अमिताभ बच्चन के एक फैन की खूबसूरत कहानी कही है।

भव्य है संगीत

फिल्म का म्यूजिक भी फिल्म की तरह की प्रयोगात्मक है। फिल्म की पहली कहानी में जब-तब लता मंगेशकर का गाना "अजीब दास्तां है ये" बजा करता है। जो कि सुनने बेहद खूबसूरत लगने के साथ दृश्यों के अनुरूप जरूरी भी लगता है। "बच्चा बच्चा बोले बच्चन बच्चन" गाना भी अच्छा बन पड़ा है। फिल्म का टाइटिल सॉन्ग "अपना बॉबे टॉकीज" सुनने से ज्यादा देखने में अच्छा लगता है। इस गाने में 100 से अधिक कलाकारों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करायी है। "अक्कड़ बक्कड़" गाना भी हिंदी सिनेमा के 100 सालों को सलाम करता हुआ दिखता है।

हर कलाकार बेहतर

इस फिल्म में हर कलाकार अपने रोल के लिए परफेक्ट लगा है। फिर भी इन चार कहानियों की इस फिल्म में सबसे अच्छा अभिनय अनुराग कश्यप की कहानी में विजय बने विनीत कुमार ने किया है। विनीत के बाद नवाजुदीन सिद्दीकी का नंबर आता है। रानी मुखर्जी, रणदीप हुड्डा, साकिब सलीम, रनवीर शौरी भी जरूरत के मुताबिक खूबसूरत अभिनय करते हैं।
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क्यों देखें

यदि आप चार-चार अलग ऐसी कहानियां देखना चाहते हैं जो अलग-अलग होते हुए भी एक-दूजे में पूरी तरह से समायी हुई है। इस यादगार फिल्म का हिस्सा बनने के लिए।

क्यों न देखें

यह एक इंटलैक्चुअल फिल्म भी है जो कहीं-कहीं पर मनोरंजन की स्वाभाविक जरूरत पूरी नहीं करती।
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