कहानी सिंपल सी है। दाऊद टाइप के दुबई में बैठे अपराधी मकसूद का एक चेला मुंबई में हीरोइन का कारोबार फैलाना चाहता है। जहीर नाम का दादा इसके खिलाफ है। मकसूद के लोकल चेले नाना से उसका पंगा होता है। पहले नाना का भाई मारा जाता है और फिर जहीर। जहीर की बीवी अशरफ इसका बदला लेने का फैसला करती है। उसको सही ठहराया जा सके इसलिए पहले उसे कानूनी लड़ाई लड़ते और फिर खुद कानून बन जाते दिखाया जाता है। कहानी शुरू यहीं से होती है, बाद में कहानी फ्लैशबैक में घूमती फिरती फिर वापस वहीं आती है।
इतनी दमदार कहानी पर एमएक्स प्लेयर चाहता तो एक सुपरहिट वेब सीरीज बना सकता था। लेकिन, बताते हैं कि एमएक्स प्लेयर में इतने ज्ञानी लोग हैं कि खुद जाकर डायरेक्टर को लोकेशन पर निर्देशन सिखाने लगते हैं। इनकी सीरीज बनाने वाले निर्देशक गरीब की गाय की तरह हां में हां मिलाते रहते हैं और नतीजा दर्शकों को भुगतना होता है। ओटीटी चूंकि फ्री में सीरीज दिखाने का दम भरता है लिहाजा कहीं भी कभी भी यूट्यूब की माफिक ब्रेक भी झेलना होता है। सीरीज की सबसे बड़ी कमजोरी इसका निर्देशन ही है। और निर्देशक की कमजोरी ये है कि उसे एपीसोड डिवीजन का ज्ञान नहीं है, कहानी को कैसे आगे बढ़ाना है इसका भान नहीं है और अपनी बात कलाकारों से मनवा सके इतना मान नहीं है।
तो कलाकार यहां कैमरा ऑन होते ही अपने हिसाब से एंगल लेते दिखते हैं। मकसूद बने अजय गेही को दाऊद जैसा दिखने का गुमान इतना है कि वह खुद को वंस अपॉन ए टाइम मुंबई का इमरान हाशमी समझने लगते हैं। नाना बने राजेंद्र ओवरएक्टिंग का शिकार हुए हैं और पुलिस इंस्पेक्टर तावड़े बने अभिजीत चव्हाण का मेलोड्रामा भी थोड़ा ज्यादा हो गया है। पूरी सीरीज में बस दो ही कलाकार जमते हैं एक तो जहीर के रोल में अंकित मोहन और दूसरी बेगम के रोल में अनुजा साठे। अनुजा साठे को यही सीरीज हिंदी सिनेमा के कलाकारों के साथ मिलने का मौका मिला होता तो बात कुछ और ही होती। उन्होंने अपनी तरफ से पूरा जोर लगाया लेकिन साथ में हैया कहने वाले कमजोर निकले। वेब सीरीज एक थी बेगम को अमर उजाला रिव्यू में मिलते हैं दो स्टार।