हुमा कुरैशी, सोनाक्षी सिन्हा
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
बेहतरीन विचार पर बनी बेकार फिल्म
सामाजिक वर्जनाओँ और परिभाषाओं को नए नजरिये से देखने की कोशिशें आयुष्मान खुराना की फिल्में करती रही हैं। अभिनेत्रियों में ये बीड़ा नुसरत भरूचा ने संभाल रखा है और अब बारी सामान्य से भारी हुमा कुरैशी और सोनाक्षी सिन्हा की है। मुकाबला इस फिल्म का जान्हवी कपूर की ‘मिली’ से है। दोनों फिल्मों की बुनावट और कसावट देखकर हिंदी सिनेमा की मौजूदा मनोदशा समझी जा सकती है। मुंबई में ठेठ उत्तर भारत से आकर सिनेमा बनाने वालों की कमी है। कमी उन लोगों की भी होती जा रही है जिन्हें उत्तर भारत समझ आता है और जो सिनेमा को सही रास्ता दिखा सकते हैं। भरमार यहां उन लोगों की है जिनके लिए डबल एक्सएल साइज सामाजिक मनोविज्ञान को मनोरंजन तरीके से दर्शकों तक पहुंचाने और सामाजिक सोच को बदलने का शानदार मौका नहीं है बल्कि उनके लिए बस ये एक और प्रोजेक्ट है जिसे रिलीज से पहले ही वे नेटफ्लिक्स, हंगामा म्यूजिक और सोनी चैनल को बेचकर मुनाफा कमा चुके हैं। अब फिल्म सिनेमाघरों में दर्शकों को पसंद आए ना आए, उनके ठेंगे से।
Amber Heard: एक्स बॉयफ्रेंड एलन मास्क के आते ही एम्बर हर्ड ने ट्विटर को कहा बाय, डिलीट किया अपना अकाउंट
नौ निर्माता, नब्बे छेद
गिनना शुरू कीजिए। भूषण कुमार, कृष्ण कुमार, हुमा कुरैशी, साकिब सलीम, मुदस्सर अजीज, विपुल डी शाह, अश्विन वरदे, राजेश बहल और फिरुजी खान, ये सब फिल्म ‘डबल एक्सएल’ के प्रोड्यूसर हैं। दो और हो जाते तो पूरी क्रिकेट टीम बन सकती थी। एक के पास एक हीरोइन है। दूसरा दूसरी हीरोइन की हां लाता है। तीसरे के पास कहानी और इन दोनों को साइन करने भर का पैसा है। बस प्रोजेक्ट बन गया। अब बस इसके लिए और पैसा लाना है। एक और प्रोड्यूसर। किसी ने इसका सौदा ओटीटी से करा दिया। एक और प्रोड्यूसर। फिर अगला बंदा सैटेलाइट का सौदा करा देता है और वह भी प्रोड्यूसर बन जाता है। हिंदी सिनेमा इन दिनों ऐसे ही चल रहा है। यहां प्रोड्यूसर को सिनेमा नहीं बनाना है, उसे बस प्रोजेक्ट बनाना है। महीने भर पहले से ट्रेलर। 10-12 शहरों या मॉल में घूम फिरकर फिल्म को ‘लीक से हटकर’ बताना और बस रिलीज होते ही सब का बैंक बैलेंस से
Phone Bhoot Twitter Review: हंस-हंसकर लोट-पोट हुए दर्शक, ईशान-सिद्धांत को बताया धांसू, कटरीना की भी हुई तारीफ
असल हिंदुस्तान से दूर होता बॉलीवुड
फिल्म ‘डबल एक्सएल’ देखने के दौरान यही सारे ख्याल आते रहते हैं। न तो इसे लिखने वालों को मेरठ के बारे में पता है कि अब दिल्ली से मेरठ सिर्फ 45 मिनट में पहुंचा जा सकता है। न ही इनको ये पता है कि टीवी प्रजेंटर का पहला काम है सितारों के आभामंडल के प्रभाव में न आना। और न ही इन्हें ये पता है कि फैशन में हॉते और कोत्यूर का फर्क क्या है। बस सब ऊपर ऊपर से हो रहा है। ये एक तरह से फिल्म दर्शकों की फिल्म कारोबार में अहमियत को नजरअंदाज करने का दौर है। मेरठ की बेटी अपने घर वालों को नजरअंदाज करके स्पोर्ट्स प्रजेंटर बनना चाहती है। दिल्ली की बेटी की मंशा फैशन डिजाइनर बनने की है। सपने हर बेटी को देखने चाहिए। लेकिन सपनों को हकीकत में बदलने की कोशिश में यहां लंदन का क्या काम? अरे, भई सब्सिडी मिलेगी ना, तो एक और प्रोड्यूसर!
Mili Review: जान्हवी कपूर की दमदार अदाकारी ने जीता दिल, मौत से दो दो हाथ करती दिखी ‘मिली’
क्वालिटी कंट्रोल बोर्ड की जरूरत
हिंदी फिल्मों की जो हालत है उसे देखते हुए कई बार तो ये भी लगता है कि सरकार को सेंसर बोर्ड तक फिल्मों के आने से पहले उन्हें एक क्वालिटी कंट्रोल बोर्ड से गुजारना चाहिए। कुछ कुछ आईएसआई मार्क जैसा कोई सिस्टम। सोचिए कि कोई फिल्म आईएसआई मार्क होगी तो दर्शकों को कुछ तो भरोसा होगा न कि फिल्म देखने जाना है तो जेब बेवजह हल्की होने का गम नहीं होगा। यहां तो हुमा कुरैशी और सोनाक्षी सिन्हा की लॉकडाउन की पिकनिक को फिल्मा लिया गया है और दर्शकों को बताया जा रहा है कि पिक्चर है, देखो। एक अच्छी खासी कहानी पर लंदन फेर देने की कोशिश का नाम है फिल्म ‘डबल एक्सएल’। ना गाने ढंग के हैं, न एक्टिंग पर किसी का ध्यान है। सबसे बड़ा दुख इस बात का है कि इस फिल्म से मुदस्सर अजीज का नाम जुड़ा है जिनकी लिखावट से हिंदी सिनेमा के दर्शकों को बड़ी उम्मीदें रही हैं।