नाट्य शास्त्र के नौ रसों में हास्य रस सबसे कठिन रस माना जाता है। इसके अवयवों के आधार पर देखें तो भले इसका स्थायी भाव हास ही हो पर आलंबन, उद्दीपन, अनुभाव और संचारी भावों के अनुसार हास्य रस उत्पन्न करने के कारक भी अलग अलग होते हैं। आसान तरीके से इसे समझना चाहें तो कटाक्ष, व्यंग्य, भोंडापन और विद्रूप हास्य को कहानी का आधार बनाकर ऋषिकेश मुखर्जी से लेकर दादा कोंडके और डेविड धवन तक तमाम निर्देशकों ने सिनेमा में हास्य की अलग अलग प्रस्तुतियां की हैं। रोहित शेट्टी की नई फिल्म ‘सर्कस’ हर तरह के हास्य पर एक दृश्य से दूसरे दृश्य में कूदती रहती है। हास्य में घटनाओं के साथ पात्रों की आकृतियों, बातचीत और चेष्टाओं से भी हास भाव उत्पन्न होता है और रोहित शेट्टी की लेखन टीम यहां दिग्भ्रमित इसलिए हो गई है कि उन्हें रोहित शेट्टी के फिल्म ‘अंगूर’ का आधुनिक संस्करण बनाने की कोशिशों को लेकर स्पष्ट दिशा ही शुरू से नहीं पता है। फिल्म ‘सर्कस’ हिंदी और दक्षिण भारतीय सिनेमा की तमाम हास्य फिल्मों के कॉकटेल जैसी फिल्म है जिसके अवयव संतुलित मात्रा में न होने से इसका कोई स्पष्ट रंग उभरकर सामने नहीं आ पाता।
सर्कस
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
उत्सुकता नहीं जगा पाई ‘सर्कस’
रोहित शेट्टी नामचीन निर्देशक हैं। फिल्म ‘जमीन’ से अपना करियर शुरू करने वाले रोहित की फिल्मों में अजय देवगन स्थायी भाव की तरह रहे। फिर रोहित के भाव बढ़े तो उन्होंने रणवीर सिंह को साथ लिया। रणवीर सिंह के साथ दिक्कत ये है कि उनके चाहने वाले उन्हें बड़ा होकर अमिताभ बच्चन बनता देखना चाहते रहे और मजा उन्हें गोविंदा बनने में ज्यादा आ रहा है। सिनेमा में काम करने वालों को लेकर दर्शकों की उत्सुकता ही फिल्मों की सफलता का पहला संकेत होती है। उधर, रणवीर सिंह जो कुछ सार्वजनिक जीवन में रोज करते रहते हैं, वही अब वह अपनी फिल्मों में कर रहे हैं तो उत्सुकता नाम की चिड़िया उनके अभिनय उपवन से फुर्र हो चुकी है। पहले ‘83’ फिर ‘जयेशभाई जोरदार’ और अब ‘सर्कस’। राज कपूर की फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ जैसा सर्कस भी फिल्म में नहीं है। 1942 से शुरू होने वाली इस कहानी मे दिखने वाला सर्कस बहुत नकली है और ऐसा इसलिए क्योंकि इस पूरे सर्कस में जानवरों की झलक तक नहीं दिखती।
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परवरिश से संस्कार की कहानी
कहानी ‘सर्कस’ की कुछ यूं है कि 1942 में एक वैज्ञानिक सरोगेसी की बात अपने समय के वैज्ञानिकों को समझा रहा है। अनाथालय में पला बढ़ा ये वैज्ञानिक फिर ये सिद्ध करना चाहता है कि संस्कार वंशानुगत नहीं बल्कि परवरिश से आते हैं। हिंदी सिनेमा में ये बात अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना की फिल्म ‘परवरिश’ में पहले भी समझाई जा चुकी है। ‘सर्कस’ में दो जोड़ी जुड़वा बच्चों की दो अलग अलग जोड़ियां बना दी जाती हैं और दोनों एक ही राज्य के दो पड़ोसी शहरों में पलने बढ़ने लगते हैं। बड़े होकर दोनों के रास्ते उस चौराहे पर आकर एक दूसरे का रास्ता काटते हैं जिसे प्रेम कहते हैं। एक पांच साल से शादीशुदा है। उसकी राइटर बीवी मां नहीं बन सकती और बच्चा गोद लेने में उसका विश्वास नहीं है। दूसरा अभी प्रेम के रास्ते में हैं और उसके मंजिल तक पहुंचने में सबसे बड़ा रोड़ा प्रेमिका का पिता है। फिर, फिल्म ‘अंगूर’ की ही तरह बहुत सारे पैसों के पीछे लगा ‘गैंग’ है। दूसरे की पत्नी के साथ रात बिताने का प्रसंग है और हीरों के हार को लेकर होने वाला भ्रम है। इसके बाद क्या होना है, सब जानते हैं।
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अंगूर बहुत ज्यादा खट्टे हैं
शेक्सपियर के विश्वचर्चित नाटक ‘कॉमेडी ऑफ एरर्स’ के तमाम रूपांतरण दुनिया भर में बने होंगे। गुलजार ने 40 साल पहले इसी नाटक पर फिल्म ‘अंगूर’ बनाई। जाहिर है संजीव कुमार, देवेन वर्मा, मौसमी चटर्जी और अरुणा ईरानी का अभिनय जिन लोगों ने इस फिल्म में देखा है, उन्हें फिल्म ‘सर्कस’ बिल्कुल पसंद नहीं आएगी। लेकिन, जिन लोगों ने फिल्म ‘अंगूर’ नहीं भी देखी है, उनके लिए भी फिल्म ‘सर्कस’ बहुत मनोरंजक फिल्म नहीं बन पड़ी है। साल के जाते जाते एक बढ़िया कॉमेडी फिल्म देखने की इच्छा लेकर ये फिल्म देखने पहुंचने वालों को सबसे ज्यादा कोफ्त इस फिल्म की पटकथा को लेकर है। चूंकि फिल्म की पटकथा ठीक से जमी नहीं है, इसलिए फिल्म का एक किरदार लगातार दर्शकों को फिल्म की कहानी समझाता रहता है। चौथी दीवार (फोर्थ वाल) का ये प्रयोग फिल्म की पटकथा की सबसे बड़ी कमजोरी है। इसके अलावा दोनों रॉय के किरदारों का ‘जुड़वा’ जैसा संबंध स्थापित करके रोहित शेट्टी ने अपनी फिल्म का और नुकसान कर लिया। फिल्म के संवाद और गए बीते हैं।
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रोहित शेट्टी का खराब निर्देशन
रोहित शेट्टी के करियर की ये 15वीं फिल्म है और जिस तरह की ये फिल्म है उसे देखते हुए ये फिल्म ‘जमीन’ और ‘बोल बच्चन’ के बाद उनकी तीसरी विफल फिल्म बनती दिख रही है। रोहित का सिनेमा लार्जर से भी लार्जर दैन लाइफ फिल्मों का सिनेमा रहा है। यहां उनके साथ दिक्कत उस जमाने को फिर से रचने की रही जिसे समझने के लिए उनके पास एक मात्र साधन हिंदी सिनेमा ही रहा। इसीलिए वह ‘राम और श्याम’ और ‘जॉनी मेरा नाम’ का जिक्र भी कहानी में लाते हैं और तमाम वे गाने भी अपनी इस फिल्म में बजाते हैं जिनकी गिनती हिंदी सिनेमा संगीत के स्वर्णिम युग के बेहतरीन गानों में होती है। लेकिन, ये सब भी फिल्म की मदद नहीं कर पाते हैं क्योंकि रोहत शेट्टी का निर्देशन इस बार न तो चौंकाता है और न ही दर्शकों का किसी तरह का संबंध कहानी के किरदारों के साथ स्थापित कर पाता है। सहायक कलाकारों की पूरी फौज हर फिल्म में साथ लेकर चलने वाले रोहित की फिल्मों के चिरपरिचित चेहरे यहां भी हैं और इनमें से अधिकतर चेहरे फिल्म को उबाऊ ही बनाते हैं।
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रणवीर पर भारी पड़े संजय मिश्रा
फिल्म रणवीर सिंह की है लेकिन काम इस फिल्म में सबसे बढ़िया संजय मिश्रा का है। मुकेश तिवारी भी प्रभावित करते हैं। सिद्धार्थ जाधव ओवर एक्टिंग का शिकार हैं। टीकू तलसानिया, बृजेंद्र काला की जोड़ी ‘अंगूर’ में सी एस दुबे और यूनुस परवेज जैसा असर नहीं छोड़ पाती है। बस ले देकर संजय ही हैं जिनके हाव भाव लोगों को थोड़ा बहुत हंसा पाते हैं। अश्विनी कलसेकर के साथ उनके दृश्य रोचक हैं और भी जब वह परदे पर आते हैं तो लोगों की दिलचस्पी फिल्म में थोड़ी और जागती है। बाकी समय फिल्म ‘सर्कस’ किसी भव्य टेलीविजन धारावाहिक सी नजर आती है। रणवीर सिंह का अभिनय एक फरमे में आकर अटक गया है। डबल रोल के दोनों किरदारों में से किसी में भी वह प्रभावित नहीं कर सके। दीपिका पादुकोण को अपनी फिल्म का आकर्षण बनाना उन्हें बंद करना ही चाहिए। दोनों का गाना इस दशक का सबसे भोंडा गाना है। न तो इसमें हास्य है और न ही श्रृंगार। इस गाने की ही तरह बाकी गानों में फिल्म का नृत्य निर्देशन बहुत ही खराब है। साफ पता चलता है कि गानों की लय ताल से नृत्य निर्देशन का कोई लेना देना नहीं है, एक से लेकर आठ तक की गिनतियों पर पीटी चल रही है। फिल्म का एक भी गाना समय की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
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ऐ भाई जरा देख के चलो!
फिल्म के तकनीकी पहलू भी ठीक नहीं हैं। जोमोन टी जॉन की सिनेमैटोग्राफी बहुत ही विचलित करने वाली है। मुरली शर्मा जब भी दर्शकों से संवाद करने की कोशिश करते हैं, कैमरे से उनका कनेक्शन बनता ही नहीं। चटख रंगों वाले फिल्म के सेट, इसके कॉस्ट्यूम भी आंखों को चुभते हैं। शेक्सपियर के लेखन की खासियत है इसका सामान्य रहते हुए भी बात विशिष्ट कहना। यहां एक विशिष्ट बात कहने के लिए रोहित शेट्टी ने शेक्सपियर के लेखन की आत्मा ही चुटहिल कर दी है। हास्य रस का पहला भाव आलंबन है और इसी पहली सीढ़ी पर रोहित शेट्टी की फिल्म ‘सर्कस’ घुटने मोड़कर बैठ जाती है। जैकलीन फर्नांडीज से तो खैर वैसे भी किसी को कोई उम्मीद नहीं रहती। उम्मीद ये थी कि पूजा हेगड़े तनकर खड़ी होंगी और ‘मोहेनजो दारो’, ‘हाउसफुल 4’ व ‘राधे श्याम’ जैसी फिल्मों का अपना खराब रिपोर्ट कार्ड बेहतर करेगी लेकिन दिग्गज सितारों की लेकिन दिग्गज सितारों की फ्लॉप फिल्मों में मौजूद रहने का हिंदी सिनेमा का उनका रिकॉर्ड ‘सर्कस’ में भी कायम है, इन दोनों हीरोइनों से बेहतर साथ तो रणवीर सिंह का वरुण शर्मा ने दिया है। बस भोंदू दिखने के लिए वह अपना वजन इतना न बढ़ाते तो और असरदार होते। फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ में गोपाल दास नीरज का लिखा गाना ‘ऐ भाई जरा देख के चलो’ ही फिल्म ‘सर्कस’ की नियति है, खास तौर से इसकी आखिरी पंक्ति ‘बिना चिड़िया का बसेरा है, न तेरा है न मेरा है..’