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शकील बदायूंनी: एक गीतकार, जिसके गीत कभी भुलाए नहीं जा सकते

Wed, 20 Apr 2016 04:43 PM IST
अखिलेश शर्मा/अमर उजाला, अमरोहा
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'मैं शकील दिल का हूं तर्जुमा, मोहŽबतों का हूं राजदां
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मुझे फख्र है मेरी शायरी, मेरी जिंदगी से जुदा नहीं।

किसी ने क्या खूब कहा है कि शायर की दास्तान उसकी पैदाईश से शुरू तो जरूर होती है लेकिन उसकी मौत पर जाकर खˆत्म नहीं होती। उसके अशआर व€क्त और जमाने की हदों के पार जाकर उसकी याद को जिंदा रखते हैं। ऐसा कहते हैं शायर पैदा तो होते हैं लेकिन कभी मरते नहीं।

यह दास्तान उस अमर शायर और गीतकार शकील बदायूंनी की है, जिसकी कहानी का आगाज तीन अगस्त 1916 को उˆतर प्रदेश के शहर बदायूं से हुआ था। 20 अप्रैल 1970 को महज 53 साल का सफर पूरा करके मुंबई में उनकी जिंदगी का अंत जरूर हो गया, लेकिन उनके गीत और शायरी दुनियाभर में लोगों की जुबान पर हैं। शकील बदायूंनी के तरानों को लोग आज भी गुनगुना रहे हैं। आखिर ऐसा क्या है उनके नगमों में, जो बरसों बाद भी हम उ‹हें गुनगुना रहे हैं।
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जिस गीतकार ने 'आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले, कल तेरी ब’म से दीवाना चला जाएगा... या फिर आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज न दे, तू गंगा की मौज मैं जमुना की धारा.. जब चली ठंडी हवा, जब से चले गए हैं वो जिंदगी जिंदगी नहीं, कोई  यार की देखे जादूगरी. जैसे मोहŽबत को जिंदगी देने वाले तराने और' अपनी आजादी को हम हर्गिज मिटा सकते नहीं, सर कटा सकते हैं लेकिन सर झुका सकते नहीं, या इंसाफ की डगर पे ब‘चों दिखाओ चलके, यह देश है तुम्हारा नेता तुम्हीं हो कल के. जैसे देशभक्ति से ओतप्रोत गीत लिखे। उनके गीतों ने मजहबी एकता की भी मिसाल कायम की।

शकील ऐसे गीतकार हैं जिनके गीत हर कोई गुनगुनाता है। ऐसे गीतों को लिखने वाला कलमकार पैंतालीस साल पहले यानी 20 अप्रैल 1970 को दुनिया छोड़कर जा चुका है। वतन को लौटने की कसक रह गई देश और दुनिया ने उ‹हें इतनी जल्दी भुला दिया इसका रंज नहीं लेकिन अजीब बात है कि बदायूं के उस वेदो टोला में उनकी दहलीज पर जमी धूल झाडऩे भी कोई नहीं पहुंचा। बरसों हो चुके उनके बेटा बहू और बेटी दामाद तक नहीं आए। उनके घर की जिस सड़क को उनके एक टेलीफोन पर उžत्तर प्रदेश के गवर्नर ने बनवा दिया था अब उस सड़क पर कोई झाड़ू लगाने भी नहीं आता।

वेदो टोला का वह जर्जर मकान आज भी शकील के लिखे नगमों की कहानी कह रहा है, उनके नगमों में भरा दर्द यहां आकर झलकता दिखता है। शकील जीवन के अंतिम क्ष‡णों में अपने पैतृक गृह बदायूं आने के लिए कई कोशिशें करते रहे लेकिन मौत के आगे उनकी कसक मन में रह गई।

काबिल अफसर न सही काबिल कलमकार बन गए

फिल्मी दुनिया में अगर शकील बदायूंनी का नाम न होता तो शायद तमाम चमक दमक के बावजूद यह दुनिया एक अजीब सी कमी से जूझती होती। फिल्मों को उनकी जिंदगी के सिर्फ बीस साल मिले लेकिन यही बीस साल शायद फिल्मी गीतों की जिंदगी में सबसे सुनहरे साल की श€क्ल में हमेशा याद किए जाते रहेंगे। क्योंकि शकील बदायूंनी की कलम से जो गीत लिखे गए, वह आज भी बजते सुनाई देते हैं तो कदम अपनी जगह ठहर से जाते हैं।

शकील को उनके वालिद पढ़ा-लिखाकर एक काबिल अफसर बनाना चाहते थे। इसके लिए बचपन में ही उ‹हें अरबी, फारसी, उर्दू और हिंदी की ट्यूशन भी कराई। वह मेहनत से पढ़ाई करते थे लेकिन दिल से शायर थे। उ‹हें अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में उ‘च शिक्षा के लिए भेजा गया तो वहां पर होने वाले मुशायरों ने उन्हें मंझे हुए शायर में बदल दिया।

दरअसल शकील को शायरी का शौक करीबी रिश्तेदार, उस जमाने के मशहूर शायर जिया उल कादिरी से आया। वह उ‹न्हें ट्यूशन भी पढ़ाते थे उन्हीं की शार्गिदी ने शकील को शायर बना दिया। अलीगढ़ में पढ़ाई पूरी करने के बाद वह 1942 से 46 तक दिल्ली में अफसर रहे, और इस तरह से अपने वालिद का ख्वाब पूरा किया। इस बीच मुशायरा और शायरी से रिश्ता नहीं टूटा।

सन 1946 में एक मुशायरे में शिरकत करने के लिये वो मुंबई गए। उनकी मुलाकात संगीतकार नौशाद से हो गई। नौशाद ने शकील की तारीफ की और निर्माता निर्देशक एआर कारदार से मिलवाया। उ‹होंने जब शकील का लिखा गीत - 'हम दर्द का अफसाना दुनिया को सुना देंगे, हर दिल में मोहŽबत की आग लगा देंगे' सुना तो उस वक्त बन रही फिल्म दर्द में उ‹हें लिखने का ‹न्यौता दे डाला।

बस फिर €या था, मुनव्वर सुलताना, श्याम और सुरैया की अदायगी से सजी इस फिल्म से एक सुरीला अफसाना शुरू हुआ। इस फिल्म सभी गीत हिट हुए।

नौशाद-शकील-मोहम्मद रफी की तिकड़ी

हिंदी फिल्मों में यह तिकड़ी ऐसी फिट बैठी की जब शकील जीवित रहे इनके आगे कोई टिक नहीं सका। शकील के गीत, नौशाद का संगीत होता था तो आवाज मोहम्मद रफी की। इ‹होंने ऐसे-ऐसे हिट गीत दिए जो आज भी हर इंसान को झकझोर कर रख देते हैं।। इन बीस सालों में शकील बदायूंनी ने 89 फिल्मों को अपने गीतों से सजाया। दीदार, बैजू बावरा, मदर इंडियाए मुगले आजम, गंगा जमुना, मेरे महबूब, चौदहवीं का चांद, साहब बीवी और गुलाम, कितनी फिल्मों का नाम लिया जाए।

उनकी शायरी ने जिस फिल्म को छू दिया वह सुपर हिट हो गयी। उनके हिस्से में भी लगातार तीन फिल्म फेयर अवार्ड आए। वर्ष 1960 में प्रदर्शित 'चौदहवीं का चांद' के चौदहवीं का चांद हो या आफताब हो, वर्ष 1961 में 'घराना' में गीत हुस्न वाले तेरा जवाब नहीं.. और 1962 में 'बीस साल बाद' में कहीं दीप जले कहीं दिल, गाने के लिये फिल्म फेयर अवार्ड से सम्मानित किया गया।

फिल्मी गीतों के अलावा शकील बदायूंनी ने कई गायकों के लिए गजल लिखी हैं जिनमें पंकज उदास प्रमुख रहे हैं। कल रात जिंदगी से मुलाकात हो गई

तेरे बगैर अजब दिल का आलम है
चराग सैकड़ों जलते हैं रोशनी कम है
कफस से आये चमन में तो यही देखा
बहार कहते हैं जिसे खिजां का आलम है।

आज शकील बदायूंनी जैसे अमर शायर की शायरी उसके तरानों को गुनगुनाया जा रहा है। आखिर ऐसा क्या है उनके नग‚मों में, जो बरसों बाद भी हम उ‹हें गुनगुना रहे हैं-

'शकील दिल का हूं तरजुमा, मुहŽबतों का हूं राजदां
मुझे फख्र है मेरी शायरी मेरी जिंदगी से जुदा नहीं।

शकील इतने बड़े और ऊंचे दर्जे के शायर और गीतकार थे कि अगर वो बदायूं की जगह अलीगढ़ या इलाहाबाद में भी पैदा होते तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था। हां वो इस दुनिया में नहीं आते तो उनके नग‚मों के बिना ये संसार कितना खाली खाली और फीका होता।

'जिंदगानी खुद हरीफे जिंदगानी हो गई।
मैंने जब रखा कदम दुनिया पुरानी हो गई।
है वही अफसाना लेकिन कहने वाले और हैं।
है वही उ‹न्वां मगर लंबी कहानी हो गयी।

शकील शायरी की दुनिया से फिल्मों में आए थे। यानी फिल्मों में आने से पहले शायरी के आसमान पर वो एक चमकता सितारा बन चुके थे। वो मुशायरों की जान हुआ करते थे । उस दौर में तर€की पसंद शायरी पूरे उफान पर थी। जुल्मतों के खिलाफ आवाज बुलंद की जा रही थी, गरीबों और लाचारों को जगाने के लिये शायरी की जा रही थी। शायरी को क्रांति का बायस माना जा रहा था। ऐसे तूफानी दौर में भी शकील उर्दू शायरी की गहरी रवायत का दामन पकड़े रहे। वो मुहŽबतों के शायर बने रहे, और मुशायरों को लूटते रहे।

'ये फलक फलक हवाएं, ये झुकी झुकी ƒघटायें
वो नजर भी €या नजर है जो ना समझ ले इशारा।
मुझे आ गया यकीं सा कि यही है मेरी मंजिल
सरे राह जब किसी ने मुझे दफ्फतन पुकारा।
कोई आये शकील देखे ये जुनूं नहीं तो €या है
कि उसी के हो गये हम जो ना हो सका हमारा।

शकील की शायरी की यही है मिसाल। मजेदार बात यह है कि शकील बदायूंनी जिस व€त मुशायरों पर हुकूमत कर रहे थे तभी ƒघर-गृहस्थी चलाने के लिये रा’य सरकार के सŒलाई विभाग में काम भी कर रहे थे। कितना अजीब था ना ये तालमेल। एक तरफ सŒलाई विभाग की नौकरी की सूखी और उबाऊ लिखा-पढ़ी। दूसरी तरफ शायरी की नाजुकतरीन दुनिया।

उनकी गाने सादे भी थे और शायरी की ऊंचाई लिए भी

'अफसाना लिख रही हूं दिले बेकऱार का, आंखों में रंग भरके तेरे इंतज़ार का'

टुनटुन यानी उमादेवी के गाये फिल्म दर्द के इस गाने से ही शुरू हुआ था गीतकार शकील बदायूंनी और संगीतकार नौशाद का साथ। दिलचस्प बात यह है कि शायरी की दुनिया से आने के बावजूद शकील ने फिल्मी गीतों के व्याकर‡ण को फौरन समझ लिया था। उनकी पहली ही फिल्म के गाने एक तरफ सरल और सीधे-सादे हैं तो दूसरी तरफ उनमें शायरी की ऊंचाई भी है। इस गाने में शकील साहब ने लिखा है'
आजा के अब तो आंख में आंसू भी आ गए
सागऱ छलक उठा है मेरे सब्र-ओ-कऱार का
अफसाना लिख रही हूं दिले बेकऱार का

किसी के इंतजार को जितने शिद्दत भरे अलफाज शकील ने दिए, शायद किसी और गीतकार ने नहीं दिए। ऐसा करते हैं कि इंतजार को शिद्दत भरे अलफाज देने की इसी बात पर हम सन 1946 से सीधे छलांग लगाते हैं सन 1949 की तरफ। एक बार फिर एआर कारदार की फिल्म। एक बार फिर नौशाद की धुन और एक बार फिर शकील बदायूंनी का इंतजार की कशिश से लबरेज न‚गमा। इस गाने को नौशाद ने राग पहाड़ी में €या खूब बनाया था। इस गाने का दूसरा अंतरा है'
तड़प रहे हैं हम यहां किसी के इंतज़ार में
खिज़ां का रंग आ चला है मौसमे-बहार में (खिज़ां यानी पतझड़)
हवा भी रूख़ बदल चुकी, ना जाने तुम कब आओगे।

फिल्म दुलारी का यह गीत गाया है मोहम्मद रफी ने। बहुत ही कम साजों के इस्तेमाल से बनाए गए गानों में यह गाना चोटी पर आता है। आज के संगीतकारों को इस गाने को सुनकर सीखना चाहिए कि अच्छा गाना बनाने के लिए बीट्स या स्ट्रिंग डालकर गाने को ठूंस ठूंस कर भरना जरूरी नहीं होता। अ‘छा गाना दिल से बनता है।

'सुहानी रात ढल चुकी ना जाने तुम कब आओगे..
'इश्क़ का कोई ख़ैरख्वाह तो है
तू नहीं है तेरी निगाह तो है
जिंदगी इस सियाह रात सही
आशिक़ी इक चराग़े-राह तो है।

शकील बदायूंनी का यह शेर सियाह और सुनसान रात को आशिकी के चिराग के सहारे काट लेने की बात करता है। शकील को रात से बेइंतिहा मुहŽबत थी और हो भी €यों ना। मुहŽबतों का शायर हर उस चीज से टूटकर Œप्यार करता है जो नाजुकतरीन होती है। फिर चाहे वो फूल की नाज़ुक पंखुडियां हों या किसी हसीन शख्स का पंखुडी जैसा नाजुक दिल। आपने शायद ही कभी Šयान दिया होगा कि एक ही गीतकार ने रात के कितने कितने रंग अपने अलग-अलग न‚मों में भरे हैं-

'आई है वो बहार के न‚ग्मे उबल पड़े
ऐसी खुशी है कि आंसू निकल पड़े
होठों पर हैं दुआएं मगर दिल पे हाथ है
कैसी हसीन आज ये बहारों की रात है

(फिल्म आदमी, मोहम्मद रफी और तलत महमूद, 1968 नोट- फिल्म में यह गीत रफी और महेंद्र कपूर की आवाज में है, दरअसल मनोज कुमार ने अपने लिए तलत की आवाज की बजाय महेंद्र कपूर की आवाज लेने पर जोर दिया और नौशाद साहब को यह बात माननी पड़ी। पर रिकॉर्ड पर रफी और तलत की ही आवाज में हैं)

शकील बदायूंनी ने सन 1967 में आई फिल्म पालकी में रात का एक और अनमोल नग्मा लिखा। हिंदी फिल्मों में कुछ गाने जैसे कालजयी बनने के लिए ही रचे गए हैं। उनमें से एक है यह गाना। फिर वही संयोग। नौशाद, रफी साहब और शकील बदायूंनी'

ऐ मेरी रूहे-गज़़ल, मेरी जाने-शायरी
दिल मानता नहीं कि तू मुझसे बिछड़ गयी
मायूसियां हैं फिर भी मेरे दिल को आस है
समझाऊं किस तरह से मैं दिल बेकऱार को
वापस कहां से लाऊं गुजऱी बहार को
मजबूर दिल के साथ बड़ी ƒबात हो गयी

हम बात कर रहे हैं शकील बदायूंनी के लिखे उन गानों की जिनमें रात का जिक्र आता है। रात के यह अलग-अलग रंग हैं। कहीं खुशियां हैं, तो कहीं गम हैं। रात कहीं जुदाई की प्रतीक है तो कहीं यह रात बहुत बदलाव लेकर आने वाली है। हिंदी फिल्मों के इतिहास की एक अजीमुश्शान फिल्म थी मुगल-ऐ- आजम। और इस फिल्म के कथानक में जब मोड़ आता है तो होती है एक कव्वाली। इश्क की बगावत की कव्वाली। जरा सुनिए शकील बदायूंनी ने इसे किस तरह लिखा है

'नग्मों से बरसती है मस्ती, छलके हैं खुशी के पैमाने
आज ऐसी बहारें आई हैं, कल जिनके बनेंगे अफसाने
अब इससे ’यादा और हंसीं ये Œयार का मौसम €या
जब रात है ऐसी मतवाली फिर सुबह का आलम €या होगा
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मैं शकील दिल का हूं तर्जुमा, मोहŽबतों का हूं राजदां

मुगल-ए-आजम फिल्म को अगर आपने ध्यान से देखा है तो आपको समझ आएगा कि ऐसी परिस्थिति में कव्वालीनुमा गीत लिखना कितनी बड़ी चुनौती रही होगी। और इसे शकील ने कितनी खूबी के साथ निभाया। इसी तरह फिल्म राम और श्याम में जब मौका आया तो शकील ने रात से जुड़ा हमारी स्मृतियों का सबसे शिद्दत भरा गाना दिया। बेवफाई से तड़पता आशिक शŽदों के जहर बुझे तीर चला रहा है और पीछे से पियानो, ग्रुप वायलिन और ढोलक की जुगलबंदी। रफी साहब की वो बेकरार आवाज और शकील के अलफाज का अंदाज' ये रात जैसे दुल्हन बन गयी चरागों से करूंगा और उजाला मैं दिल के दागों से,

तू मेरा साथ न दे राहे मुहŽबत में सनम,
चलते चलते मैं किसी राह पे मुड़ जाऊंगा
कहकशां चांद सितारे तेरे चूमेंगे कदम
मेरे रस्ते की मैं एक धूल बन जाऊंगा

साथ मेरे मेरा अफसाना चला जायेगा
कल तेरी ब’म से दीवाना चला जायेगा
शम्मा रह जायेगी परवाना चला जायेगा

शकील के लिखे रात के न‚मों का सिलसिला यहीं खˆम नहीं हो जाता बल्कि फिल्म कोहीनूर में एक नई ऊंचाई पर पहुंचता है। यह गाना ख्वाबों की ताबीर का गाना है। जिंदगी के खुशनसीब पलों का न‚ग्मा है। शकील लिखते हैं-

'जिनसे मिलने की तमन्ना थी, वो ही आते हैं
चांद तारे मेरी राहों में बिछे जाते हैं
चूमता है तेरे क़दमों को गगन आज की रात,
सारी दुनिया नजऱ आती है दुल्हन आज की रात

नौशाद ने इस गाने के इंटरल्यूड में पश्चिमी ढंग के कोरस का इस्तेमाल किया है, ऊपर से रफी साहब और लता जी की आवाज की मासूमीयत, जिससे यह गाना और भी बेहतरीन बन गया है। कामयाबी का चमकते सितारे को नमन बीस साल में शकील कामयाबी की बुलंदियों पर जा पहुंचे लेकिन इस ऊंचाई से उतरना उ‹हें गवारा नहीं था। वह सिर्फ 53 साल के थे। मुबई के एक अस्पताल में भर्ती हुए कभी ठीक होकर वापस न आने के लिए 20 अप्रैल 1970 को अस्पताल में उ‹होंने आखरी सांस ली। उस वक्त उनकी शरीक-ए-हयात उनका बेटा और बेटी के अलावा कुछ दोस्त अस्पताल में मौजूद थे। फिल्मी दुनिया का एक सुनहरा सफर पूरा हो गया था। अब पैंतालीस साल के बाद जब हम उ‹न्हें याद कर रहे हैं। अगले साल उनकी स्वर्ण जयंती मनाएंगे तो यह कैसे भूल पाएंगे जो शकील ने कहा था'

मैं शकील दिल का हूं तर्जुमा, मोहŽबतों का हूं राजदां
मुझे फख्र है मेरी शायरी, मेरी जिंदगी से जुदा नहीं।
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