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रिदम कला महोत्सव: मनोज श्रीवास्तव और शशांक गर्ग ने महिला सशक्तिकरण पर रखे विचार, कहा-पुरुषों को उनकी सीमाएं समझाना जरूरी

Thu, 03 Mar 2022 01:37 AM IST
रोमा रागिनी एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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रिदम कला महोत्सव - फोटो : Social Media
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अंजना वेलफेयर सोसायटी के सहयोग से रिदम कला महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस महोत्सव के दौरान संगीत एवं नृत्य की कार्यशाला आयोजित की जा रही है। 26 जनवरी से शुरू हुआ यह कला महोत्सव 45 दिन तक आयोजित किया जाएगा। यह कला महोत्सव बीते 8 सालों से आयोजित किया जा रहा है। इस महोत्सव के तहत हर सप्ताहांत में कला के क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति इस महोत्सव के तहत आयोजित होने वाली कार्यशाला का हिस्सा बनते हैं।

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इस सप्ताहांत आयोजित कार्यशाला में अंजना वेलफेयर सोसाइटी की फाउंडर कत्थक नृत्यांगना माया कुलश्रेष्ठ ने महिला सशक्तिकरण पर लेखक और आईएस मुख्य सचिव मध्य प्रदेश मनोज श्रीवास्तव और पुलिस अधीक्षक डायल 100 रेडियो जोन भोपाल के पुलिस अधीक्षक शशांक गर्ग से बातचीत की। महोत्सव की कार्यशाला में मेहमानों ने देश में महिला के सामने चुनौती और समाज में उनके जीवन पर विस्तृत चर्चा की।


सवाल: आप किताब अपराजिता में एक तरफ पौराणिक कथाओं और शक्ति की बात करते हैं। दूसरी तरफ इसी विचार को आप पश्चिम से जोड़ देते हैं। ऐसा कैसे और क्यों करते हैं?

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जवाब: हम ऐसे संसार में रह रहे हैं, जो तुलना का संसार है। हम किसी चीज का महत्व तभी समझ पाते हैं, जब हम उसकी तुलना करते हैं। हम ऐसे संसार में नहीं है, जहां सिर्फ भारतीय दर्शन माना जाएगा और दूसरे देशों का दर्शन नहीं माना जाएगा। मैंने अध्ययन किया तो पाया कि कुछ जगहों पर भारतीयता का गलत चित्रण किया गया है। इसलिए जरूरी है कि इसको रिलेटिव टर्म से देखूं। अपराजिता में मैंने बताया है कि भारत को पश्चिम देशों के तरह देवी आंदोलन नहीं चलाना पड़ा। हमारे पुराणों में पहले से ही शक्ति की अवधारणा है। जब पश्चिम में स्त्रियों के लिए पुरुष गार्ड रखे जाते थे, तब भारत में देव के लिए भी भारतीय देवियां होती थीं। 


सवाल: महिला सशक्तिकरण की बात करें तो मीरा एक बहुत मजबूत महिला थीं। आप मीरा को कैसे देखते हैं। उन्होंने कई प्रथाओं को तोड़ा और कला से पहचान बनाई। मीरा की आज की नारी से कैसे तुलना करते हैं?

जवाब: मै मीरा का बहुत सम्मान करता हूं। मीरा समाज द्वारा स्त्री के लिए खींचे गए ढांचे से इंकार करती हैं। मीरा मध्यकालीन समय में समाज के बंदिशों के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहीं थीं। वर्तमान में स्त्री को बांध दिया गया है। आोशा की जाती है कि वो एक पत्नी और मां की भूमिका में दिखें। मीरा ने इस दोनों भूमिका से इंकार कर दिया। वहीं राधा प्रेम की मूर्ति हैं। वो भी किसी उपाधी से मुक्त हैं। सीता और पार्वती प्रेमिका के साथ पत्नी भी हैं लेकिन मीरा और राधा के पास सिर्फ प्रेम हैं। उपाधि मुक्त प्रेम सरल नहीं होता है। 
 

सवाल: शशांक जी आपको लगता है कि समाज में आज भी ऐसे लोग हैं, जिनके कारण महिलाएं आगे नहीं बढ़ पा रही हैं? आज भी महिलाओं को दबाया जाता है?

जवाब: समाज में एक दम सबकुछ नहीं बदल जाता है।धीरे-धीरे चीजें बदल रही हैं। हम सौभाग्यशाली हैं कि हम सशक्त लोकतंत्र में रह रहे हैं, जहां हम लोगों को स्वीकार करते हैं। अभी कुछ जगह रोक-टोक और बंधन हैं लेकिन ये भारतीय परंपरा और लोकतंत्र की खूबसूरती है कि हम अपनी बात रख सकते हैं। स्त्रियां भी अपनी बात रख रही हैं। सबसे बड़ी शक्ति प्रश्न पूछने की होती है। स्त्रियां आज सवाल पूछ सकती हैं। 


सवाल-कई बार औरतें अपने पर किए गए अत्याचार को लेकर कानून तक पहुंच जाती हैं लेकिन बाद में वो पीछे हट जाती हैं। शशांक जी किस वजह से वो पीछे हट जाती हैं? 
जवाब: हम इन मामलों को स्त्री की अस्मिता से जोड़कर देखते हैं। जबकि जो शोषक है उसको झिझकना चाहिए, उसको थमना चाहिए। समाज में कई धारणाएं हैं, जो गांठें बन गई हैं। महिलाओं पर घर और समाज का भी दवाब होता है लेकिन स्त्री अगर सोच लेती है कि कानून के पास जाना चाहिए तो उसे दबाया नहीं जा सकता।

सवाल: मनोज सर आपने शहरी और ग्रामीण दोनों परिवेश की महिलाओं के साथ काम किया है। क्या आपको लगता है कि ग्रामीण महिलाओं को पता नहीं होता कि वो किससे शिकायत करें या किसके पास जाएं? आपको लगता है कि जागरुकता की कमी है?
जवाब: हमलोग स्त्री को समझाते हैं कि सेल्फ डिफेंस कैसे करना है। कानून के विकल्प क्या हैं लेकिन उससे कहीं ज्यादा पुरुष को समझाना जरूरी है कि वो अपनी सीमाएं समझें। पुरुषों को जागरुक करना बहुत जरूरी है। 
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अमर उजाला इसमें मीडिया पार्टनर है।



 
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