सौ साल पहले जब कैमरे के पास डबल रोल प्रस्तुत करने जैसी तकनीक नहीं थी, उस समय में एक फिल्म ने डबल रोल को अंजाम दिया, वो भी एक अलग अंदाज में। ये फिल्म थी 1917 में आई 'लंका दहन'। रामायण के सुंदर कांड पर आधारित धुंधीराज गोविंद फाल्के यानी दादा साहेब फाल्के की इस फिल्म के मुख्य कलाकार अन्ना सालुंके थे।
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अन्ना ने इस फिल्म में राम और सीता दोनों के किरदार निभाए। किसी भारतीय फिल्म में डबल रोल की शुरुआत करने वाले सालुंके पहले भारतीय कलाकार थे।
फिल्म समीक्षक पवन झा बताते हैं, "दादा साहेब फ़िल्म में सीता के किरदार के लिए किसी महिला कलाकार की तलाश कर रहे थे. लेकिन उस ज़माने में महिलाओं का फिल्मों में काम करना बुरा समझा जाता था, इसलिए महिलाओं के किरदार भी पुरुष ही निभाया करते थे।"
सालुंके इससे पहले दादा साहेब की फिल्म राजा हरीशचंद्र में तारामति का किरदार निभा चुके थे. उस किरदार से उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गई थी कि फाल्के साहब को उन्हें सीता के रूप में कास्ट करना ही पड़ा।
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सौ साल की हुई पहली डबल रोल फिल्म
- फोटो : CHANDRAKANT PUSALKAR
1914 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान फ़िल्मों का कारोबार धीमा पड़ गया था। ऐसे में जब लंका दहन 1917 में रिलीज हुई तो दर्शकों ने इसे हाथों हाथ लिया। सालुंके के स्टारडम के बारे में पवन कहते हैं, "सालुंके को उस दौर का सुपरस्टार कहा जा सकता है क्योंकि लोग राम और सीता के रूप में फिल्मी पर्दे पर उनके दर्शन के लिए ही आते थे।"
उस वक्त के फिल्ममेकर होमी वाडिया ने सालुंके को सीता के रूप में देखकर मजाकिया अंदाज में कहा था कि फाल्के साहब की हीरोइन्स के बाइसेप्स हैं। सालुंके उस जमाने के सबसे लोकप्रिय अभिनेता और अभिनेत्री दोनों थे।
कमाई के मामले में भी ये फिल्म काफी आगे रही। पवन बताते हैं, "इस फिल्म का कलेक्शन सिनेमा हाल से बैलगाड़ी में भरकर भेजे जाते थे। करीब दस दिन में ही इस फिल्म ने 35 हजार रुपये कमाए थे जो उस जमाने में बड़ी रकम थी।"
इस फिल्म से पहले दादा साहब फाल्के के पास ओपन एयर स्टूडियो था। लेकिन इस फिल्म ने इतनी कमाई कर डाली थी कि दादा साहेब ने एक शानदार स्टूडियो बना लिया। कह सकते हैं कि इस फिल्म की कमाई ने भविष्य की भारतीय फिल्मों की नींव रखी।
हिंदी सिनेमा दो माध्यमों से प्रेरित होता रहा है- साहित्य और रंगमंच। दोनों में ही डबल रोल को प्रस्तुत करना मुश्किल था। फिल्मों में डबल रोल, पूरी तरह से कैमरा का खेल रहा है। फिर चाहे फिल्म 'गोपी-किशन' में 'मेरे दो-दो बाप' वाला सीन याद कर लीजिए, या 'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स' में तनु और कुसुम का आमना-सामना।
100 वर्षों में डबल रोल के कॉन्सेप्ट को अलग-अलग ढंग से दर्शकों के सामने पेश किया गया है।
1. फिल्मों में भाई-भाई या बहन-बहन को ध्यान में रखकर रचे गए डबल रोल। जैसे राम और श्याम, सीता और गीता, चालबाज, जुड़वा, धूम-3।
2. हमशक्ल वाली जुड़वा फिल्में, जैसे कसमे वादे, सच्चा-झूठा, छोटे-मियां बड़े मियां, हमशक्ल्स।
3. एक ही कलाकार द्वारा किए हीरो और विलेन के डबल किरदार वाली फिल्में, जैसे, डुप्लीकेट, डॉन, फैन।
4. कहानी को डबल रोल के तौर पर प्रस्तुत करने वाली फिल्में, जिनमें अंत में किरदार एक ही रहा, जैसे ज्वैल थीफ।
कुछ फिल्में ऐसी भी रही जिसमें बजट के चलते या शूटिंग के दौरान आई परेशानी की वजह से मजबूरी में एक ही कलाकार ने दो किरदार निभाए। जैसे फिल्म 'शोले' में मुश्ताक खान एक सीन में पारसी और दूससे सीन में रेल इंजन के ड्राइवर बन गए।