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Farrey Review: अलीजेह ने किया 2023 का सबसे चौंकाने वाला डेब्यू, सलीम खान को नातिन से मिला बेस्ट बर्थडे गिफ्ट

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फर्रे रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
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Movie Review
फर्रे
कलाकार
अलीजेह , साहिल मेहता , जेन शॉ , प्रसन्ना बिष्ट , रोनित बी रॉय , जूही बब्बर सोनी और शिल्पा शुक्ला आदि
लेखक
अभिषेक यादव और सौमेंद्र पाढी
निर्देशक
सौमेंद्र पाढी
निर्माता
अतुल अग्निहोत्री , अलविरा खान , सुनीर खेत्रपाल , वाई रविशंकर और नवीन येरनेनी
रिलीज
24 नवंबर 2023
रेटिंग
3/5
इंदौर से मुंबई हीरो बनने आए प्रिंस सलीम जब स्टोरी राइटर सलीम खान के नाम से मशहूर हुए होंगे, तब भी उनको क्या ही अंदाजा रहा होगा कि उनका बेटा हिंदी सिनेमा का सुपरस्टार बनेगा। और, उनकी बेटी की बेटी भी एक दिन पश्तूनों के इस खानदान का नाम एकाएक उनके ऐन जन्मदिन पर रिलीज होने जा रही फिल्म से यूं रोशन करेगी, ये बात तो सलीम अब्दुल राशिद खान ने तब सपने में भी नही सोची होगी। फिल्म ‘फर्रे’ का ट्रेलर सच पूछें तो बहुत प्रभावी नहीं था और इसीलिए जब अलीजेह के पिता अतुल अग्निहोत्री का फोन इस फिल्म को रिलीज से कई दिन पहले देखने के लिए आया तो मैं बहुत उत्साहित भी नही था। लेकिन, उस खास प्रिव्यू थियेटर में फिल्म देख रहा हर बंदा इंटरवल तक ही अपने सारे पूर्वाग्रह भूल चुका था। पहले तो सब डरे हुए थे कि कहीं अलीजेह भी अनन्या, सारा और अलाया जैसी ही न निकले। लेकिन, अलीजेह इस साल का सबसे चौंकाने वाला डेब्यू है। उनकी अदाकारी के चर्चे अभी बरसों बरस चलते रहने वाले हैं।

 

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फर्रे रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
महंगे स्कूल में गरीबी की होशियारी
फिल्म ‘फर्रे’ थाईलैंड की एक फिल्म ‘बैड जीनियस’ की आधिकारिक रीमेक है। फिल्म का हिंदी अनुकूलन इसके निर्देशक सौमेंद्र पाढी ने ‘कोटा फैक्ट्री’ की राइटिंग टीम में शामिल रहे अभिषेक यादव के साथ मिलकर किया है। फिल्म की कहानी दिल्ली में हाल के दिनों में खूब चर्चित रहे उन एडमीशन मामलों की आंख का काजल चुराती है जिनमें महंगे स्कूलों को भी इलाके के गरीब बच्चों के लिए कुछ फीसदी सीटें रखने का आदेश जारी हुआ था। ऐसा ही एक स्कूल इस फिल्म की कहानी में है। स्कूल इतना महंगा है कि इसमें स्कूल बस ही नहीं चलती है। सब मर्सिडीज, ऑडी जैसी गाड़ियों में स्कूल पढ़ने आते हैं। बस, पढ़ने नहीं आते हैं। बाकी सब वह करते हैं। ऐसे में ‘होनहार बिरवान के होत चीकने पात’ जैसे दो छात्र आते हैं। लड़के को डिलीवरी बॉय का काम छोड़ विदेशी यूनिवर्सिटी पढ़ने जाना है। जाना लड़की को भी है, लेकिन वह चतुर है, सयानी भी और चंट भी। राइटिंग टीम ने उसको कारण दिया है उस अनाथालय की गरीबी का जहां वह बचपन से पली बढ़ी है और जल्द ही 18 साल की होकर यहां से किसी दूसरे अनाथालय जाने वाली है। लड़की को पैसे कमाने का लालच देते हैं उसके मुंहबोले दोस्त। और, एक बार आसानी से पैसे कमाने की लत लग जाए तो रामानुजन जैसी होशियार ये छोकरी भी फिर रुकने का नाम नहीं लेती।

फर्रे रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
शिक्षा पद्धति का ‘जामताड़ा’
ओडिशा से मुंबई आए निर्देशक सौमेंद्र पाढी ने साल 2016 में अपनी पहली फिल्म बनाई थी, ‘बुधिया सिंह बॉर्न टू रन’। फिल्म की तारीफ तो हुई लेकिन उन्हें दूसरी फिल्म नहीं मिली। अब ओटीटी सीरीज ‘जामताड़ा’ ने उनके भाग जगा दिए हैं। सलमान खान फिल्म्स की प्रस्तुति ‘फर्रे’ ने उनको एकदम से हिंदी फिल्म जगत के ए लिस्टर्स की नजर में ला दिया है। सलमान खान की बहन अलविरा और उनके पति अतुल अग्निहोत्री की बेटी के डेब्यू की जिम्मेदारी उठाना सौमेंद्र के लिए आसान नहीं रहा होगा। लेकिन, इस मुश्किल भरी जिम्मेदारी में अपने निर्देशक की भरपूर मदद की है, फिल्म के युवा सितारों अलीजेह, साहिल, जेन और प्रसन्ना ने। अरसे से एक टीनएजर मूवी देखने के लिए फिल्म ‘आर्चीज’ की राह तक रहे हिंदी फिल्म दर्शकों के लिए फिल्म ‘फर्रे’ बिल्कुल अनपेक्षित सरप्राइज है। ये एक ऐसी फिल्म है जिसे देखने का माहौल अकेले अपने बूते इसकी हीरोइन अलीजेह ने बनाया है। जिस अंदाज से वह पूछती हैं, ‘ऐ तेरी कोई बंदी है क्या?’ वह देखने लायक है।

फर्रे रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अलीजेह का अद्भुत आगाज
अलीजेह अग्निहोत्री ने एक लपूझन्ना टाइप लव स्टोरी की बजाय एक ऐसी फिल्म के जरिये डेब्यू किया है जो है तो शिक्षा पद्धति पर लेकिन इसमें लुटेरों जैसी फिल्म का मजा है। अंग्रेजी में कहे तो एजूकेशन फिल्म में हाइस्ट का तड़का। जिस थाई फिल्म पर ये फिल्म बनी है, उसमें भी लीड रोल करने वाली अभिनेत्री ने डेब्यू किया था और यहां अलीजेह पर तो पूरी इंडस्ट्री की निगाहें हैं। पता नहीं कि इसमें कितनी उनके एक्टिंग कोच एम के रैना की मेहनत है और कितना उनका अपना रियाज, लेकिन अलीजेह ने हाल फिलहाल सिनेमा के बड़े परदे पर उतरी न्यू मिलेनियल्स अभिनेत्रियों में सबको अपनी पहली ही फिल्म मे पीछे छोड़ दिया है। ये लड़की आंखों से बोलती है। चुप्पी से संवाद करती है और इसके हाव भाव ऐसे हैं कि यकीन ही नहीं होता कि ये इसकी पहली फिल्म है। सलीम खान को तो इससे अच्छा बर्थडे गिफ्ट पूरी लाइफ में शायद ही दूसरा कोई मिला हो, सलमान खान को भी अपनी इस भांजी पर नाज होगा और शायद थोड़ा सा रश्क भी..! रश्क इसलिए क्योंकि अलीजेह की तारीफ एक स्टार वाली तारीफ नहीं, बल्कि एक एक्टर वाली होनी है।

फर्रे रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
प्रसन्ना, साहिल और जेन की जानदार अदाकारी
लेकिन, अलीजेह की तारीफों में कहीं फिल्म के दूसरे कलाकारों के साथ नाइंसाफी न हो जाए तो बात फिल्म के उन तीन कलाकारों ने जिन्होंने अलीजेह के साथ मिलकर इसकी कहानी के चारों कोने साधे हैं। इन तीनों में अव्वल नंबर हैं प्रसन्ना बिष्ट। पहले ही सीन से काइयां शैतान नजर आने वाली छवि की भूमिका में प्रसन्ना ने कमाल की एक्टिंग की है। पापा से मिलने उनके ऑफिस जाने वाले सीन में और फिर नियति को इम्तिहान में अपनी मदद के लिए तैयार करने वाले सीन में प्रसन्ना का काम देखने वाला है। आकाश के रोल में साहिल और प्रतीक के रोल में जेन शॉ ने अपने अपने हिस्से का खेल खूब बढ़िया खेला है। दोनों अनुभवी अभिनेता हैं और अलीजेह के अभिनय को सजाने में पूरी मदद भी करते हैं। रोनित रॉय का अपना अलग रौला है और जूही बब्बर! फिल्म ‘फराज’ के बाद जूही ने फिर एक बार तालियां बटोरी हैं। वह न्यू मिलेनियल्स की सबसे बेहतरीन मां का कोई अवार्ड होता हो तो जरूर जीत सकती हैं। तकनीकी रूप से भी फिल्म अच्छी बन पड़ी है। कीको नाकाहारा के कैमरे का कमाल और एडिटर जुबिन शेख की लयताल ठीक हैं। मुकेश छाबड़ा ने फिर एक बार चैंपियन वाला काम इसकी कास्टिंग में किया है।
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फर्रे रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, यहां आकर लड़खड़ा गई फिल्म
फिल्म की इतनी सारी अच्छाइयां गिनाने के बाद अब बारी इसकी कमजोर कड़ियों की। इनमें से कुछ तो अलीजेह की नजर उतारने जैसी हैं और कुछ सौमेंद्र पाढी की अपनी कमजोरियों के चलते हैं। फिल्म की पृष्ठभूमि स्कूली शिक्षा है लेकिन इसमें जो परीक्षा पद्धति चुनी गई है, वह इंटरनेशनल बोर्ड की है। राज्य स्तरीय बोर्ड परीक्षाएं या सीबीएसई और आईसीएसई बोर्ड से परीक्षा देने वाले युवाओं को भी इसका ये एंगल समझने में थोड़ा समय लगेगा। उनके माता पिता को तो देर तक समझ नहीं आएगा कि ये परीक्षाएं आखिर सिर्फ ऑप्शन वाली ही क्यों हैं, ऐसा कौन सा स्कूल है देश में जहां उत्तर लिखना ही नहीं है, बस गोले काले करने हैं। फिल्म की दूसरी सबसे कमजोर कड़ी है इसकी मार्केटिंग। फिल्म के बारे में माहौल बनाने के लिए कतई कोई कोशिश ही नहीं हुई है। कानपुर, लखनऊ, मेरठ, वाराणसी, अहमदाबाद, इंदौर जैसे शहरों के आम लोगों को तो पता भी नहीं है कि ऐसी कोई फिल्म रिलीज हो रही है। डिजिटल ट्रैकिंग फिल्म की जीरो से कुछ ही ऊपर होगी। सोशल मीडिया पर  ‘फर्रे मूवी’ सर्च करने पर कुछ ऐसा नहीं दिखता है जिससे फिल्म देखने की ललक पैदा हो सके। फिल्म की पीआर एजेंसी का काम और माशा अल्लाह है।
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