सुपरिचित अभिनेता अशोक कुमार जब पहली बार फिल्मी दुनिया में आए, तब उनकी तनख्वाह थी कुल पछत्तर रुपये प्रति मास।
अकेली जान - और वह भी मलाड जैसे दूरस्थ उपनगर के वासी के लिए - इतने रुपये उन दिनों काफी भी थे। फिर जब उनका वेतन एक दम दोगुना यानी डेढ़ सौ रुपये हो गया, तब उन्हें और भी खुशी हुई, लेकिन जब डेढ़ से बढ़ कर वह अचानक ढाई सौ पर पहुंच गया तब वह विविध दुश्चिन्ताओं से सराबोर होने लगे।
उन दिनों की याद करते हुए अशोक ने एक बार अपने परम मित्र सआदत हसन मंटो को बताया था, `बाई गॉड, तनख्वाह में इस बढ़ोतरी से मेरी हालत सच में अजीबो-गरीब हो गई थी।
ढाई सौ रुपये! दफ्तर के खजांची से जब पहली बार मैंने इतनी रकम ली, तो मेरे हाथ अचानक कांपने लगे थे। समझ में नहीं आता था कि इतने सारे रुपये मैं आखिर रखूंगा कहां?
मेरा घर कोई आलीशान मकान नहीं, छोटा सा क्वार्टर भर था। एक चारपाई थी, दो तीन टीन की कुर्सिया होंगी और फिर घर के चारों ओर बेतरतीब फैला हुआ जंगल।
रात के अंधेरे में अगर कोई चोर आ जाए और उसे इस बात का पता चल जाए कि मेरे पास इतने सारे रुपये हैं तो मेरी क्या हालत होगी, मैं यही सोचने में लगा हुआ था।
घर लौटते हुए मैंने बहुत सारी स्कीमें बना डालीं। फिर वहां पहुंचते ही उन नोटों को मैंने अपनी चारपाई के नीचे बिछी दरी के नीचे छिपा दिया और करता भी क्या?
तब भी सारी रात मुझे डरावने सपने आते रहे। और सवेरे सोकर उठने के बाद जो पहला काम मैंने किया वह था उन रुपयों को वहां से उठा कर डाकखाने में जमा करने का- सच में!’