मैंने जब से होश संभाला था, तभी से एक्टर बनने का भूत सवार था। हम चेम्बूर में रहते थे और मेरे पिता उस समय के.आसिफ को ‘मुगल-ए-आजम’ में असिस्ट कर रहे थे। फिर बाद में वह प्रोड्यूसर बने, तो शुरू से ही घर में फिल्मी माहौल रहा, इसलिए शुरू से मेरा रुझान फिल्मों की तरफ रहा। मैं घंटों आर. के. स्टूडियो के बाहर खड़ा रहता था और सोचता रहता था कि कैसे अंदर जाऊं? बाहर जो सिक्योरिटी गार्ड होते थे, उनसे कई बार अंदर जाने की मिन्नत करता था।
वह दौर भी एकदम अलग था। आर. के. स्टूडियो के अंदर जाना ही एक बड़ा खूबसूरत अहसास होता था। मेरे पिता एक फिल्म प्रोड्यूसर थे, लेकिन ऐसा नहीं कि मैंने कभी संघर्ष नहीं किया। उनकी फिल्मी जगत में बहुत लोगों से जान-पहचान थी, उसके बावजूद मैंने इतना लंबा सफर तय किया, उसमें मेरा संघर्ष और मेहनत है। चेम्बूर में आर. के. स्टूडियो के बाहर घंटों खड़ा रहना ही तब बड़ी बात थी।
हम एक छोटे से कमरे में रहा करते थे, वहीं से मेरा संघर्ष शुरू हुआ। पिताजी जब के. आसिफ को फिल्म 'मुगल-ए-आजम' के लिए असिस्ट कर रहे थे, तभी मैंने दिलीप कुमार को देखा था। उनका व्यक्तित्व मेरे दिल को छू गया। इसके अलावा राजकपूर, शम्मी कपूर, शशि कपूर साहब से काफी इंस्पायर हुआ।
फिर देव आनंद साहब का दीवाना रहा। मैं उनसे भी बहुत प्रभावित रहा। उनका हरफनमौला अंदाज मुझे बहुत भाता था। इन्हीं दिग्गजों को देखकर बड़ा हुआ और उनको हमेशा से फॉलो किया। मेरा शुरू से यही मानना रहा है कि आप जैसे लोगों के साथ रहते हैं, वैसा ही आपका व्यक्तित्व बनता है। अच्छे लोगों के साथ रहोगे, तो अच्छा काम मिलेगा और मैं जिनके साथ रहा भी वह सब अच्छे हैं। इसके अलावा भी कई सारी यादें हैं मेरे बचपन की।
जैसे मैं और बोनी बहुत लड़ा करते थे और वे अक्सर मुझे पीट दिया करते थे। मैं मार खाने के बाद घर से भागकर स्कूल के मैदान में चला जाता था। हम दोनों में उम्र का ज्यादा फासला नहीं है, तो भाई से ज्यादा हम दोस्त जैसे हैं। मेरे और बोनी के बीच बहुत झगड़े हुआ करते थे। उनका मुक्का जब मेरी पीठ पर पड़ता था, तो बहुत दर्द होता था। इसके बाद मैं नाराज होकर स्कूल के मैदान में बैठ जाया करता था और फिर वे मुझे मनाने आया करते थे।
बोनी का मेरे करियर में बहुत ज्यादा योगदान है। मेरे और बोनी के बीच का रिश्ता भाई से बढ़कर है। मेरे एक्टर बनने में शशि कपूर साहब का भी योगदान है। कॉलेज में एक प्ले में हिस्सा लिया था। उस फंक्शन में शशि कपूर साहब चीफ गेस्ट थे और मुझे बेस्ट एक्टर की ट्रॉफी उन्हीं के हाथों मिली थी।
ट्रॉफी का नाम भी ‘दिलीप कुमार’ था और उसे जीतने की खुशी भी अलग ही थी। जब शशि कपूर ने मेरे प्ले को देखा, तो उसके बाद उन्होंने ही मुझे कई जगह रिकमेंड किया। मैं शुरू से ही नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में जाना चाहता था, क्योंकि मुझे लगता था कि वहां मुझे बेहतर सीखने को मिलता। मैंने फॉर्म भी भरा था, लेकिन तब यहां पुणे इंस्टीट्यूट में एडमिशन लेने की होड़ लगी थी, इसलिए वहां नहीं जा पाया।
उसके बाद मैंने पुणे इंस्टीट्यूट में टेस्ट दिया, पर किस्मत में शायद कुछ और लिखा था और मैं वहां फेल हो गया। फेल होने के बाद मैं सीधा गिरीश कर्नाड जी के पास गया, वह तब वहां प्रिंसिपल थे। मैंने उनसे पूछा कि इंस्टीट्यूट में एडमिशन के लिए टेस्ट देना क्यों जरूरी है? आप उसके बदले मेरा स्क्रीन टेस्ट ले लें। लेकिन उन्होंने मना कर दिया और कहा, 'नियम, तो नियम हैं हम इसे बदल नहीं सकते'।
उसके बाद मैंने रोशन तनेजा के इंस्टीट्यूट से कोर्स किया। कोर्स खत्म हो गया था, लेकिन मंजिल दूर थी। काम नहीं मिल रहा था, फिर मैंने प्रोडक्शन में भी थोड़ा काम करना शुरू किया। मेरा काम एक्टर्स को एयरपोर्ट से प्रोडक्शन हाउस तक लाना होता था। उनके लिए खाने-पीने का इंतेजाम करना होता था।
काफी मेहनत करने के बाद मुझे वर्ष 1979 में उमेश मेहरा की फिल्म 'हमारे-तुम्हारे' मिली, लेकिन सफलता नहीं मिली। लेकिन कहते हैं न, सब्र का फल मीठा होता है, तो फल मीठा मिला। मुझे वर्ष 1983 में फिल्म 'वो सात दिन' मिली और उसमें मैं हीरो के रोल में था। लोगों ने मुझे सराहा। मेरा काम पसंद किया और फिल्म सफल हुई। बस इसी तरह मेरा सफर शुरू हो गया। मैं जानता हूं कि मैंने पहले रोल के लिए कितनी मेहनत की थी।
मैंने शुरू के दौर में बहुत संघर्ष देखा है, इसलिए मैं छोटी-छोटी खुशियों को जीना जानता हूं। इस उम्र में लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं कि अनिल तुम आज भी अपने काम को इतना एन्जॉय करते हो, खुश दिखते हो। तो मेरा कहना यही होता है, 'हां, आज भी सेट पर पहुंचकर मुझे बहुत खुशी मिलती है, क्योंकि मैं अपने काम से बहुत प्यार करता हूं।
मैं हर शॉट से, हर व्यक्ति से, अपने को-स्टार से कुछ न कुछ सीखता हूं, तो इससे बड़ी बात क्या होगी? परेशानियां सबके जीवन में आती हैं, लेकिन मैं कोशिश करता हूं कि मेरे काम और मेरे आस-पास के लोगों पर उसका प्रभाव न पड़े।'
- जिंदगी की डायरी से: